कुछ दोस्तों के
साथ बैठा मैं लगातार खिड़की से बाहर देखे जा रहा था, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी, भयंकर गर्मियों
के दिन थे, इस भयंकर गर्मी
में खिड़की से आती हवा भी कोई राहत नहीं पंहुचा रही थी, मैंने खुद को
गर्मी से बचने के लिए अपने गमछे को पानी से भिंगो कर अपने ऊपर लपेट रखा था, इस से कुछ तो
राहत थी ही | एक छोटे से
स्टेशन पर गाडी रुकी लोग दौड़ते हुए गाडी से उतर कर प्लेटफोर्म पर बने प्याऊ की तरफ
दौड़ पड़े, कुछ ने अभी पानी
भरा और कुछ अभी भर ही रहे थे कि ट्रेन धीरे-धीरे खिसकने लगी | इस बीच मैंने
अपने गमछे को दुबारा भिंगो कर खुद से लपेट लिया था, अब कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा था | अचानक मेरी नजर
बगल वाले सीट पर बैठे एक मुस्लिम परिवार पर पड़ी, दो औरतें और एक आदमी एक तरफ बैठे हुए थे | इतनी गर्मी में
जबकि मैंने अपने को बचाने के लिए गीले कपडे से ढँक रखा था फिर भी मेरी पीठ टेक
लेकर बैठने की वजह से जल चुकी थी जिसका पता मुझे बाद में चला, उस परिवार की
दोनों औरतें बुरका पहनें बैठीं थीं जबकि उनके साथ ही बैठा वो इंसान केवल लुंगी में
बैठा था | इस बारे में
चर्चा चल ही रही थी कि ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुचने वाली थी जिसकी वजह से अब धीमी
गति से चल रही थी, हमारे पास भी पानी ख़त्म हो चुका था और मैं अपने दोस्त
पर दबाव डाल रहा था कि वो ट्रेन से उतर कर प्याऊ से पानी भरे की अचानक मेरी नजर
प्याऊ पर खड़े उस लड़की पर पड़ी |
एक नजर में ही इस
भयंकर गर्मी से रहत मिल गयी ऐसा लगा जैसे चाँद अपनी पूरी शीतलता के साथ खुद ही
धरती पर उतर आया हो, उस चम्बल के बीहड़ में दोपहर का सूरज भी ऐसा लगा जैसे
इस चाँद के आगे सर झुका कर उसकी सुन्दरता का सम्मान करते हुए अपनी कठोरता कुछ कम
कर रहा है, सीप सी आँखे जैसे
अभी बोल पड़ेंगी, बालों को कस कर
बाँधा गया जूडा और उसमे से निकल कर एक लट चेहरे पर इठलाती हुई ऐसे लग रही थी जैसे
मोगरे की बेलें किसी पेड़ का आलिंगन करने को उतारू हैं, और अचानक ही उसने
वो किया जिसके बारे में मैं सोच रहा था अपने दायें हाँथ से उस नटखट लट को सजा के
तौर पर चेहरे से हटाते हुए अपने दायें गालों के पीछे दबा दिया, अब वो लट फिर से
उस प्यारे मुखड़े को चूमने के लिए मचल रही थी | इधर उन लटों में मैं इतना उलझा था की समझ नहीं पा रहा
था कि मेरा दोस्त क्या बोले जा रहा है, मैं अपलक उस चेहरे को देखे जा रहा था |
कुछ संयत हो कर
मैं उठा और अपने दोस्त के हांथों से पानी की बोतल लेकर उस प्याऊ की तरफ झपटा, तेज क़दमों से
चलते हुए मैं उसकी तरफ बढ़ा एक-एक पल बरसों में बीत रहा था, फासला कम हो रहा
था और सम्मोहन बढ़ रहा था, कब उस सौन्दर्य की जीती-जागती मूर्ति के पास पहुँच
गया पता ही नहीं चला, उसके बालों से आती हल्की सुगंध मुझे पागल बना देने पर
मजबूर कर रही थी, अचानक ही वो नटखट
लट किसी तरह अपने जेल को तोड़कर वापस अपने पुराने काम पर लग चुकी थी, उसने एक बार मेरी
तरफ देखा और अचानक ही मेरी नजरों से उसकी नजरें टकरायीं, भावनाएं बह
निकलीं ऐसा लगा जैसे मैं अपनी सुध-बुध खो दूंगा, और उधर उसने फिर से एक झटके से अपनी पतली लट को सजा
दी, तब मेरी नजर उसके
हांथों पर पड़ी, मेहंदी से सजे को
हाँथ इस बात का सबूत थे कि ये
सौन्दर्य किसी और के लिए है |
मेरे पीछे से आते
मेरे दोस्त ने मुझे एक हल्का धक्का मारा और मेरे हांथों से पानी की बोतल लेकर पानी
भरने लगा, इस बीच पता नहीं
कब पर मैंने उस सौन्दर्य की मूर्ति के हांथों को पकड़ा, उसकी आँखे और बड़ी
हो गयीं, मैंने उन मेहंदी
लगे हांथों पर एक लम्बा और प्रगाढ़ चुम्बन अंकित किया, मेहंदी की खुसबू
मेरी नाक से होती हुई दिल तक उतर गयी, उसकी बड़ी हुई पहले आँखे शर्म से झुक गयीं और फिर बंद
हो गयीं, अचानक एक लम्बे
से आदमी ने मेरी तरफ देखा और मुझे धक्का दिया, उसके हाँथ मेरे हांथों से निकल गए, उसने मुझे एक और
धक्का दिया तब जाकर मुझे थोडा होश आया, उसने अपने दाहिने हाँथ को घूसे की शक्ल प्रदान की और
मेरे चेहरे की तरफ लहराया, मैं भावनाओं से निकल चुका था और झुक कर उसके प्रहार
को खाली जाने दिया, वो लड़खड़ा गया |