Monday, July 27, 2015

वो लड़की

कुछ दोस्तों के साथ बैठा मैं लगातार खिड़की से बाहर देखे जा रहा था, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी, भयंकर गर्मियों के दिन थे, इस भयंकर गर्मी में खिड़की से आती हवा भी कोई राहत नहीं पंहुचा रही थी, मैंने खुद को गर्मी से बचने के लिए अपने गमछे को पानी से भिंगो कर अपने ऊपर लपेट रखा था, इस से कुछ तो राहत थी ही | एक छोटे से स्टेशन पर गाडी रुकी लोग दौड़ते हुए गाडी से उतर कर प्लेटफोर्म पर बने प्याऊ की तरफ दौड़ पड़े, कुछ ने अभी पानी भरा और कुछ अभी भर ही रहे थे कि ट्रेन धीरे-धीरे खिसकने लगी | इस बीच मैंने अपने गमछे को दुबारा भिंगो कर खुद से लपेट लिया था, अब कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा था | अचानक मेरी नजर बगल वाले सीट पर बैठे एक मुस्लिम परिवार पर पड़ी, दो औरतें और एक आदमी एक तरफ बैठे हुए थे | इतनी गर्मी में जबकि मैंने अपने को बचाने के लिए गीले कपडे से ढँक रखा था फिर भी मेरी पीठ टेक लेकर बैठने की वजह से जल चुकी थी जिसका पता मुझे बाद में चला, उस परिवार की दोनों औरतें बुरका पहनें बैठीं थीं जबकि उनके साथ ही बैठा वो इंसान केवल लुंगी में बैठा था | इस बारे में चर्चा चल ही रही थी कि ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुचने वाली थी जिसकी वजह से अब धीमी गति से चल रही थी, हमारे पास भी पानी ख़त्म हो चुका था और मैं अपने दोस्त पर दबाव डाल रहा था कि वो ट्रेन से उतर कर प्याऊ से पानी भरे की अचानक मेरी नजर प्याऊ पर खड़े उस लड़की पर पड़ी |

एक नजर में ही इस भयंकर गर्मी से रहत मिल गयी ऐसा लगा जैसे चाँद अपनी पूरी शीतलता के साथ खुद ही धरती पर उतर आया हो, उस चम्बल के बीहड़ में दोपहर का सूरज भी ऐसा लगा जैसे इस चाँद के आगे सर झुका कर उसकी सुन्दरता का सम्मान करते हुए अपनी कठोरता कुछ कम कर रहा है, सीप सी आँखे जैसे अभी बोल पड़ेंगी, बालों को कस कर बाँधा गया जूडा और उसमे से निकल कर एक लट चेहरे पर इठलाती हुई ऐसे लग रही थी जैसे मोगरे की बेलें किसी पेड़ का आलिंगन करने को उतारू हैं, और अचानक ही उसने वो किया जिसके बारे में मैं सोच रहा था अपने दायें हाँथ से उस नटखट लट को सजा के तौर पर चेहरे से हटाते हुए अपने दायें गालों के पीछे दबा दिया, अब वो लट फिर से उस प्यारे मुखड़े को चूमने के लिए मचल रही थी | इधर उन लटों में मैं इतना उलझा था की समझ नहीं पा रहा था कि मेरा दोस्त क्या बोले जा रहा है, मैं अपलक उस चेहरे को देखे जा रहा था |

कुछ संयत हो कर मैं उठा और अपने दोस्त के हांथों से पानी की बोतल लेकर उस प्याऊ की तरफ झपटा, तेज क़दमों से चलते हुए मैं उसकी तरफ बढ़ा एक-एक पल बरसों में बीत रहा था, फासला कम हो रहा था और सम्मोहन बढ़ रहा था, कब उस सौन्दर्य की जीती-जागती मूर्ति के पास पहुँच गया पता ही नहीं चला, उसके बालों से आती हल्की सुगंध मुझे पागल बना देने पर मजबूर कर रही थी, अचानक ही वो नटखट लट किसी तरह अपने जेल को तोड़कर वापस अपने पुराने काम पर लग चुकी थी, उसने एक बार मेरी तरफ देखा और अचानक ही मेरी नजरों से उसकी नजरें टकरायीं, भावनाएं बह निकलीं ऐसा लगा जैसे मैं अपनी सुध-बुध खो दूंगा, और उधर उसने फिर से एक झटके से अपनी पतली लट को सजा दी, तब मेरी नजर उसके हांथों पर पड़ी, मेहंदी से सजे को हाँथ इस बात का सबूत थे कि ये  सौन्दर्य  किसी और के लिए है |

मेरे पीछे से आते मेरे दोस्त ने मुझे एक हल्का धक्का मारा और मेरे हांथों से पानी की बोतल लेकर पानी भरने लगा, इस बीच पता नहीं कब पर मैंने उस सौन्दर्य की मूर्ति के हांथों को पकड़ा, उसकी आँखे और बड़ी हो गयीं, मैंने उन मेहंदी लगे हांथों पर एक लम्बा और प्रगाढ़ चुम्बन अंकित किया, मेहंदी की खुसबू मेरी नाक से होती हुई दिल तक उतर गयी, उसकी बड़ी हुई पहले आँखे शर्म से झुक गयीं और फिर बंद हो गयीं, अचानक एक लम्बे से आदमी ने मेरी तरफ देखा और मुझे धक्का दिया, उसके हाँथ मेरे हांथों से निकल गए, उसने मुझे एक और धक्का दिया तब जाकर मुझे थोडा होश आया, उसने अपने दाहिने हाँथ को घूसे की शक्ल प्रदान की और मेरे चेहरे की तरफ लहराया, मैं भावनाओं से निकल चुका था और झुक कर उसके प्रहार को खाली जाने दिया, वो लड़खड़ा गया |

अभी तक मै वहीं खड़ा था जब मेरे दोस्त ने मुझे पकड़ कर अपनी तरफ खींचा, ट्रेन पटरियों पर सरकने लगी थी, दोस्त ने मुझे ट्रेन की तरफ धकेला और खुद भी दौड़ पड़ा, आखिर हमने ट्रेन पकड़ ही लिया, दरवाजे पर खड़े होकर मैंने एक बार फिर उस लड़की की तरफ देखा जो उस लम्बू के साथ अपने ट्रेन की तरफ घिसटती जा रही थी, हमारी ट्रेन अभी भी पटरियों पर रेंग रही थी, शायद मुझे उसे देखने का आखिरी मौका दे रही थी, दूसरी तरफ उनकी ट्रेन भी चल दी, मैं अपने होंठो पर उसकी नर्म हथेलियों का अहसास और दिल में बसी मेहंदी की गन्ध लिए एक गहरी सांस भर ट्रेन के दरवाजे से उनकी ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखता रहा, खिड़की से दिखते मेहंदी से रचे उसके हाँथ आखिर क्षितिज में लुप्त हो गए |

Monday, July 6, 2015

वो जो हम में तुम में क़रार था...

आज राजीव की संस्था "मुस्कुराता बचपन" को गरीब बच्चों के लिए किये गए उत्कृष्ट कार्यों के लिए के लिए सम्मान दिया गया था | जिसके बाद उसने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था, जिसमे उसने चंदा देने वाले सभी सभ्यजनों को बुलाया था, खुद ही दरवाजे पर खड़ा होकर उनका स्वागत भी कर रहा था, एक के बाद एक मेहमान आते जा रहे थे, अभी राजीव एक मेहमान और उनकी पत्नी से बात कर ही रहा था कि उसके कंधे पर किसी का हाँथ पड़ा, उसने मुड कर देखा, सामने एक अनजान को खड़ा पा कर उसने अपना हाँथ बढ़ाते हुए बोला " राजीव " और सामने वाले ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ उसका हाँथ अपने हाँथ में थाम कर बोला "समीर , नहीं पहचान पाए न ?" राजीव और समीर एक दुसरे को फ़ोन और फेसबुक के माध्यम से जानते तो थे और उनके बीच में संस्था के कार्यों को लेकर बात भी होती थी पर, मिल पहली बार रहे थे | राजीव ने हँसते हुए कहा " हाँ यार पहचान नहीं पाया, पर तुम्हारी मूछें कहा गयी ? फेसबुक पर तो मुछों वाली फोटोज लगा रखी है ?" समीर चहकते हुए बोला " वो यार, बेगम साहिबा के कहने पर हटा दी " राजीव थोडा मस्ती में बोला " ओहो क्या बात है ! बीबी के गुलाम, खैर भाभी को लाया या नहीं " समीर हँसते हुए बोला " हाँ-हाँ लाया हूँ, शायद थोडा पीछे रह गयी हैं वो लो वो आ गयीं" इतने में समीर की पत्नी रेवती उन दोनों के पास पहुंची, समीर एक तरफ हटते हुए उन दोनों का परिचय करवाया " रेवती ये राजीव  प्रसिद्ध समाज सेवी और "मुस्कुराता बचपन" के कर्ता-धर्ता, और राजीव ये मेरी पत्नी रेवती" राजीव ने मुस्कुराते हुए हाँथ जोड़ कर रेवती की तरफ देखा और फिर देखता ही रह गया...उधर रेवती ने भी अपना हाँथ जोड़ कर राजीव की तरफ देखा...रेवती और राजीव दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि भाग्य उनके साथ ऐसा कैसे कर सकता है, जिस बात को गुजरे हुए तीन लम्बे साल बीत गए थे, आज अचानक उनके सामने कैसे आ गया...दोनों के जेहन में यादों की परतें एक-एक कर खुलती गयीं...समीर का ख्याल कर के दोनों ने एक दुसरे को औपचारिक रूप से नमस्कार किया और फिर रेवती समीर का हाँथ पकड़ अन्दर चली गयी, राजीव यादों की गहराइयों में डूबता चला गया...

करीब तीन साल पहले... राजीव अभी अपनी जिंदगी में कुछ पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, एक शाम जब वो बाजार से सब्जी लेकर, अपनी ही धुन में गुनगुनाता हुआ सड़क के किनारे चलता जा रहा था, अचानक एक जोरदार टक्कर ने उसको अपने ख्यालों से निकल कर धरातल पर ला पटका, सड़क पर गिरने के कारण उसके सर पर चोट लगी जिस से खून बहने लगा, अभी उसको ये समझ भी नहीं आया था की क्या हुआ क्या नहीं, की पीछे से आती आवाज ने उसको सड़क पर लेटे-लेटे ही मुड़ने पर मजबूर कर दिया, " अंधे हो गए हो क्या देख कर नहीं चल सकते, तुम्हे किसने बताया की सड़क के बीच में चलते हैं, जाहिल-गवांर कहीं का ?" राजीव को अब अपनी भूल समझ में आई, कान में लगे हैडफ़ोन और अपनी ही धुन में होने के कारण उसको पता ही नहीं चला की कब वो इस सुनसान गली के एकदम बीच में चलने लगा "पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं हे, तुमको मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली थी क्या ? बेवक़ूफ़ कहीं का" राजीव को अगली आवाज सुनाई दी, उसने उठ कर खुद पर लगे धुल को झाड़ा और फिर हाँथ जोड़ कर बोला " माफ़ कीजिये, गलती हो गयी, ये गली अक्सर सुनसान रहती है, इसलिए मैंने भी ध्यान नहीं दिया" पहली बार उसने उस लड़की की तरफ देखा पर अँधेरे की वजह से कुछ साफ़ नहीं दिखाई दिया, फिर उसने झुक कर उस लड़की की गिरी हुई स्कूटी को उठाया और उसको खड़ा कर उसकी जांच करने लगा, जबकि वो लड़की अपने कपड़ों पर लगी धुल को झाड़ने में व्यस्त थी कि बगल से गुजरने वाली कार ने उसका ध्यान राजीव की तरफ खींचा, कार के प्रकाश में राजीव के सर से निकलते खून को देख कर बोली " ओह, आपको तो काफी चोट लगी है, चलिए मैं आपको हॉस्पिटल ले चलती हूँ " राजीव ने अपने सर पर लगे खून को पोंछा और बोला "नहीं थोड़ी सी चोट है, घर जा कर मैं दवा लगा लूँगा, आप परेशान ना होइए मैं ठीक हूँ " लड़की बोली " ऐसे कैसे ठीक हैं इतना खून बह रहा है, चलिए आपको आपके घर तक छोड़ देती हूँ " राजीव अपनी सब्जियाँ उठाते हुए बोला " नहीं-नहीं रहने दीजिये, मैं चला जाऊंगा" लड़की बोली " ऐसे कैसे मेरी वजह से आपको चोट लगी है, चलिए मैं आपको आपके घर छोड़ देती हूँ" और उसने अपनी स्कूटी स्टार्ट कर दी, राजीव चुप चाप पीछे बैठ गया...

दोनों राजीव के घर पहुंचे, फिर लड़की ने राजीव के सर पर दवा लगाकर पट्टी बाँध दी, उसके बाद राजीव से को बिस्तर पर लिटा कर उस से पूछ कर चाय बना लायी, चाय पीते-पीते बातों का सिलसिला चल पड़ा राजीव ने पूछा " आपने मेरी इतनी मदद की है, और मैं अभी तक आपका नाम भी नहीं जानता हूँ ?" लडकी ने मुस्कुराकर कहा " रेवती, और मै भी तो आपका नाम नहीं जानती हूँ?" राजीव ने अपना नाम बताया और दोनों बातों में मशगूल हो गए, कुछ देर बाद रेवती चली गयी | तीन दिन के बाद रेवती फिर से राजीव के घर आई और इस बार दोनों ने दिन भर बातें की, धीरे-धीरे मिलने का ये सिलसिला चल पड़ा, मिलने मिलाने का ये सिलसिला कब प्यार में बदला दोनों में से कोई नहीं जान सका | साथ जीने और साथ मरने की कसमों के साथ ही ये प्यार और गहरा होता गया, एक दिन राजीव ने रेवती को मिलने के लिए बुलाया और खुद उस जगह पर पहुच कर इंतज़ार करने लगा धीरे-धीरे समय बीतता गया औरसुबह से शाम हो गयी, पर वो ना आई, राजीव इंतज़ार करता ही रह गया | बाद में पता चला कि रेवती के पिता ने उसको मिलने से मना कर दिया, और फिर जल्दी जल्दी में एक लड़का ढूंढ कर उसकी शादी कर दी | वो दिन था और आज का दिन राजीव अभी भी उसका इंतज़ार करता था, और यही एक वजह थी की उसने आज तक शादी नहीं की थी |


मोमिन खान मोमिन की गज़ल की हलकी आवाज ने राजीव को यादों की गहराइयों से निकाल कर वास्तविकता की धरातल पर ला पटका  "वो जो हम में तुम में क़रार था..."