Sunday, May 31, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-8

गतांक से आगे ....

राधिका  " बोला था न मैंने की मै आपको सरप्राइज दूंगी "
ये सुन कर भी श्याम को विश्वास नहीं हुआ वो अभी भी बिना पलकें झपकाए राधिका की तरफ देखता जा रहा था
राधिका  " हेल्लो ! क्या हुआ? मुझे देख कर ख़ुशी नहीं हुई क्या? "
अब तक श्याम थोडा संभल चुका था
श्याम  " हं... क्यों..क्यों नहीं, बहुत ख़ुशी हुई "
राधिका  " बोला था ना की मै आपको सरप्राइज दूंगी "
श्याम  " हाँ बोला तो था "
राधिका  " तो कैसा लगा मेरा सरप्राइज ? "
श्याम  " हं... ब...बहुत अच्छा "
राधिका  " आगे आगे देखिये होता है क्या? "
श्याम  " क्या मतलब? "
राधिका  " कुछ नहीं, चलें? "
श्याम  " हाँ -हाँ चलते हैं "
फिर दोनों स्टेशन के बाहर निकल गए | आज पहली बार श्याम की बाइक के पीछे वाली सीट पर राधिका बैठी थी, और श्याम इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था | अचानक एक सुनसान जगह पर राधिका ने बाइक रोकने के लिए कहा, और श्याम कुछ सोचते हुए बाइक को सड़क के किनारे खड़ा कर दिया | राधिका उतर गयी और आने बैग से एक जैकेट निकल कर पहनने  लगी तभी श्याम का मोबाइल बज उठा श्याम ने देखा मोहन का कॉल था, उसने फ़ोन उठाया
श्याम  " हेल्लो ! हाँ भैया बोलिए "
मोहन  " ट्रेन आ गयी या नहीं? "
श्याम  " आ गयी और हम यहाँ से निकल चुके हैं घंटे भर में घर पहुच जायेंगे "
मोहन  " तो कैसा लगा सरप्राइज? "
श्याम  " अच्छा ! तो ये आपकी मिली-भगत से हुआ है, आईडिया किसका था? "
मोहन  " राधिका का, मैंने तो बस अपना पार्ट निभाया है "
राधिका ने तब तक अपना एक कदम श्याम की ओर बढाया और उसके बालों को पकड़ कर अपनी तरफ खींचा जिस से श्याम आगे की तरफ थोडा झुक गया और उसी समय राधिका ने अपने होंठो को श्याम के होंठों पर रख दिया....
श्याम  " अच्.......... "
श्याम  " ये क्या? “उसने राधिका को धक्का देकर अपने से दूर किया और पूछा
राधिका  " तुम्हारे लिए, अब मै भी तुम्हे अपने दोस्त से ज्यादा मानती हूँ "
मोहन  " श्याम-श्याम क्या हो रहा है ? "
राधिका  " अब ये मत कहना की आपने मुझे अपने दिल से निकाल दिया है "
श्याम  " नहीं-नहीं आप मेरा पहला और आखिरी प्यार हैं "
मोहन  " क्या हो क्या रहा है वहां "
श्याम (मोहन से ) " मै घर पहुच कर बात करता हूँ "
मोहन  " सब ठीक है ना? "
श्याम  " हाँ सब ठीक है मै आकर बात करता हूँ "
और श्याम ने फ़ोन काट दिया
श्याम  " ये क्या था ? "
राधिका  " आपके सवाल का जवाब "
श्याम  " मैंने सवाल कब पूछा? "
राधिका  " उस दिन जिस दिन आपने मैसेज किया था "
श्याम  " उस दिन मैंने कोई सवाल नहीं पूछा था बस अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं "
राधिका  " ओके-ओके तो मैंने भी अपनी भावनाएं ही व्यक्त की हैं "
श्याम  " ठीक है, अब चलते हैं वर्ना देर हो जाएगी " 

अगले भाग में जारी ....

Friday, May 29, 2015

बिहार का शोक

भादों का महीना था ऐसा लगता था की दो सेनाओं के बीच में भयंकर समर छिड़ा हुआ है एक तरफ पृथ्वी की सेना तो दूसरी तरफ जल की सेना | जल की सेना ने पृथ्वी की सेनाओं में कोहराम मचा रखा था, अपने बादलों के वायुयान पर चढ़कर जल-शरों की वर्षा से पृथ्वी के ह्रदय को बेध कर जीर्ण-शीर्ण कर दिया था | कृशांगी कोशी आज अपने पुरे उफान पर थी , गाँव और कस्बों को निगलती हुई किसी पौराणिक राक्षस की तरह लग रही थी, उसकी लहरें मुह से फेन निकालती, कई हांथों तक उछल अपनी भयंकरता का प्रमाण देने में लगी हुई थीं | पगली रोज की तरह आज भी उसके बाढ़ से उफनाये तट पर बैठी अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रही थी जो पिछले साल ऐसी ही बढ़ में बाह गया था और आज तक वापस नहीं आया था | उसे हैरत हो रही थी की साल भर एक पतली रेखा की तरह बहने वाली यह सुरसरि की सहायक नदी इस वर्ष ऐसे क्यूँ लग रही है जैसे की एक चतुर योद्धा युद्ध लड़ने से पहले अपने पैंतरे बदल रहा हो, कभी एक कदम आगे आती कभी एक कदम पीछे लौट जाती और फिर किसी नयी वास्तु को निगलने के लिए चक्कर खा कर वापस लौटती | कितने ही झोंपड़े इस अथाह जलराशि में डगमगाते हुए किसी नशे में चूर शराबी की तरह बहे जा रहे थे | अचानक उसे पीछे से किसी ने पुकारा "ओ पगली हियाँ का कर रही है, अरे उ नाही आवेगा, चला गया", पगली ने मुड़कर देखा 2 नौजवान लड़के रमई और चित्तन पास के ही गाँव के, खड़े लहरों का आनंद ले रहे थे, नया खून किसी विभत्स नज़ारे का भी आनंद ही लेता है | एक नजर डाल कर पगली दुबारा लहरों की तरफ देखने लगी | अभी भी वही वीभत्स नजारा था, सहसा एक किश्ती नजर आई जिसपर कई स्त्री-पुरुष बैठे थे, बैठे क्या थे एक दुसरे से चिपके हुए थे | कश्ती कभी उपर होती कभी नीचे होती जैसे लहरें उसे पेंग देकर झूला झुला रही हों | लेकिन किसी अज्ञानी बालक की तरह लहरें ये भूल गयी थीं की ज्यादा पेंग देने पर झूले के भी पलटने की संभावना होती है | किश्ती पर बैठे लोगों की साँसे टंगी हुई थीं की अब पलटी तब पलटी |

करवटें लेती किश्ती आखिर उलट ही गयी, उसपर बैठे सभी प्राणी डूबते-उतरते दिखाई देने लगे, कुछ देर तक दिखाई दिए फिर वो भी उस जलराशि की तरंगो के हिस्से बन कर खो गए, केवल एक उजली सी चीज तैरती हुई किनारे की ओर आ लगी | ध्यान से देखने पर प्रतीत हुआ की एक लकड़ी के लठ्ठ के सहारे चिपका हुआ कोई बच्चा है | पगली और वो दोनों युवक खड़े हो गए थे, तीनो ही उस बच्चे को निकल लाने के लिए विकल हो रहे थे, पर इस तरह जब नदी बढ़ी हो तो एक कदम भी नदी में रखना अपनी मौत है, ये वो तीनो ही जानते थे, रमई जो थोडा लम्बा था " जाये के त चल जाये लेकिन कहीं पांव उखड जैहें त सीधे बंगाल के खाड़ी में मिलिहे "
पगली "मै जाती हूँ"
रमई "जाये के त हमहूँ तैयार हैं, लेकिन उहाँ तक पहुँच पैबें की ना इम्मा संदेह बा | देख नहीं रही हो केतना जोरदार तोड़ ह"
पगली एक कदम पानी में रख के बोली "नाहीं-नाहीं अबहियें निकल लावत हूँ "
रमई सशंक होकर "काहें नाहक में जान देवे पे तुली हुई हो हम तो जाइये रहत थे"
पगली "तुमको हमारी कसम है इहाँ न आना, हमको तैरना आता है अबहियें लावत हैं"
चित्तन "हमको तो तैरना ही न आवत है, पर देखत में तो एक बच्चे का लाश लागत है"
रमई "शायद अब्बे जान हो, का भरोसा"
चित्तन "लागत है पगली को तैरना आवत है, जभी हिम्मत हुई"
रमई उसकी की तरफ चिंतित नजरों से देख कर बोला "हां , कुछ-कुछ त जानत है, हमका तो लज्जा आवत है "
चित्तन "एमा लज्जा वाला कवन बात, जियत होईत त हमहूँ तोहका भेजते, लेकिन लाश खातिर कवन आपन जान जोखिम में डाले"
रमई "इहाँ से कवन जान सकत है की जान है की ना, सहिये बाल-बच्चा वाला मनइ नामरद हो जात है"

उधर पगली तैरते-तैरते उस लट्ठ तक पहुच चुकी थी, उसने उस पर चिपके हुए बच्चे की बस एक झलक देखा तो उसे लगा की ये उसका अपना बच्चा है जो पिछले साल इसी बाढ़ में बह गया था | उन्माद में इंसान को कुछ नहीं सूझता है, पगली अपने बच्चे को पाने के उन्माद में थी और जल्दी से उसका हांथ पकड़ कर तट की तरफ तैरने लगी, अगर पगली लड़के का हाँथ के बजाये उस लट्ठ को धकेल कर तट की तरफ ले जाती तो उसको कम उर्जा खर्च करनी पड़ती | पगली तट से कुछ ही दूर थी की एक लहर के जोर में आ गयी और कुछ दूर तक नदी के साथ साथ बह गयी लेकिन वो फिर संभली और तट की तरफ दुबारा तैरने लगी लेकिन उसकी हिम्मत अब जवाब देने लगी थी | एक लहर के जोर से निकल कर अभी वो एक हाँथ ही तैरी थी की एक और लहर ने उसको दबा दिया | रमई आखिर नदी में कूद ही पड़ा और जोर जोर से पुकारने लगा "पगली पगली हम आवत हैं |


पगली में अब लड़ने की शक्ति नहीं थी पर कुछ तो वही लड़के को पाने का उन्माद था जो उसको अभी तक तैरने पर विवश कर रहा था | रमई जैसे ही उन दोनों के पास पंहुचा एक और लहर आई और पगली को बहा ले गयी लेकिन बच्चे का हाँथ रमई के हांथों में आ गया, कुछ क्षण बाद ही पगली के काले बाल नजर आये, परन्तु यह उसकी अंतिम झलक थी | वह फिर न नजर आई |

Sunday, May 24, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-7

गतांक से आगे ....

राधिका से बात करने के बाद मोहन ने बहुत देर तक सोचा की क्या बहाना बनाये और ये चक्कर क्या है पर मोहन को कुछ समझ नहीं आया | अभी मोहन सोच ही रहा था की उनकी पत्नी ने उनको बताया की उनके कुछ रिश्तेदार आ रहे हैं जिनको लेने के लिए जाना होगा और तभी मोहन के दिमाग में एक बार आई, और उसने श्याम को फ़ोन किया
मोहन  " कब आ रहे हो सालगिरह पर? "
श्याम  " बताया तो था भैया कि सालगिरह वाले दिन से एक दिन पहले शाम को आऊंगा "
मोहन  "  वो तो ठीक है पर एक समस्या है "
श्याम  " क्या? "
मोहन  " हमारा एक रिश्तेदार है जो सालगिरह से एक दिन पहले आ रहा है, उसको लाना है "
श्याम  " कौन आ रहा है? "
मोहन  " तुम्हारी भाभी के भैया "
श्याम  " कब? "
मोहन  " सालगिरह वाले दिन सुबह ४ बजे की गाड़ी से "
श्याम  "  उनको कोई और ट्रेन नहीं मिली क्या? " '
मोहन  " नहीं मिली तभी तो "
श्याम  " ओ तो समस्या ये है की उन्हें लेने के लिए सुबह स्टेशन जाना पड़ेगा? "
मोहन  " हाँ "
श्याम  " ये तो बहुत बड़ी समस्या है "
मोहन  " है तो कोई समाधान है क्या इसका? "
श्याम  " सोचने दीजिये "
मोहन  " ठीक है "
श्याम  " एक समाधान है "
मोहन  " क्या? "
श्याम  " मै रुक कर उनको लेते हुए आऊँ "
मोहन  "  हाँ ये सही है पर तुमको कोई समस्या न हो तो "
श्याम  "  सुबह उठने में दिक्कत तो होगी पर मै कर लूँगा  "
मोहन  " तो ये ठीक रहा की तुम शाम को ना आ कर सुबह उनको लेकर आओगे "
श्याम  " मगर मै उनको पहचानता नहीं हूँ " '
मोहन  "  ट्रेन तो पता ही है मै सीट नंबर और बोगी नंबर बता दूंगा तुम ढूढ लेना और वो तुम्हे पहचानते हैं "
श्याम  " फिर ठीक है मै उन्हें लेता आऊंगा "

उसके बाद मोहन ने राधिका से पूछ कर सारी बातें श्याम को बता दी, पर अभी तक मोहन की समझ में ये नहीं आया था कि ये क्या चल रहा है पर उसने सोचा की जो भी होगा श्याम उसे बता ही देगा आखिर बचपन से उसने कुछ छुपाया नहीं है तो ये क्यों छुपायेगा | उसके बाद मोहन अपने पार्टी की तैयारियों में लग गया | आख़िरकार वो दिन आ ही गया जिस दिन राधिका के द्वारा श्याम को सरप्राइज मिलने वाला था | नियत दिन और समय पर श्याम जब अपने बाइक से रेलवे स्टेशन जा रहा था तो वो थोडा गुस्से में भी था की आखिर क्यों उसने ऐसा कहा की  " मै लेता आऊंगा " | खैर मन ही मन कुढ़ते हुए वो स्टेशन पर पंहुचा और ट्रेन का इंतज़ार करने लगा, जोकि अपने नियत समय से २० मिनट की देरी से चल रही थी | जैसे-तैसे कर के श्याम ने समय काटा और आखिरकार गाड़ी के भी आने का सिग्नल हो गया | ट्रेन के प्लेटफोर्म पर पहुचते ही श्याम दौड़ कर उस बोगी के पास पंहुचा जिसमे राधिका को आना था | वो बेसब्री से इन्तजार करने लगा की कौन है वो जो इस ट्रेन से आ रहा है और जिसको लेकर उसे जाना था | अचानक श्याम के कंधे पर किसी ने हाँथ रखा, और श्याम जैसे ही पीछे मुड़ा, उसके आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा, सुबह ४ बजे  रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म नंबर ३ पर राधिका खड़ी थी, एक बार को तो श्याम ने सोचा की ज्यादा जल्दी उठने और बहुत ज्यादा राधिका के बारे में सोचने के कारण उसे वह इंसान राधिका दिख रही है 

अगले भाग में जारी ....

Friday, May 22, 2015

गुनाह

गाँव की पंचायत बैठी थी और रमेसर पर बहुत ही गंम्भीर इल्जाम लगाया जा चुका था, इस बात का फैसला पंचायत ही कर सकती थी उसे इस इल्जाम की क्या सजा मिलनी है, एक कोने में रमेसर और उसका बापू अपने छोटे भाई के साथ खड़े थे और दुसरे कोने में सविता अपने बड़े भाई और बापू के साथ खडी थी, रमेसर पर इल्जाम था इसी सविता से मिलने वो रात में चुपके-चुपके गया था | सविता के पिता और भाई बहुत ही गुस्से में नजर आ रहे थे और सविता चुप-चाप नज़रें झुकाए हुए अपने पैर के अंगूठे से जमीन की मिटटी कुरेदने में लगी थी, उसका दिल जोरों से धड़क रहा था, उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कल रात को रमेसर से उसका मिलना भाई देख चुका है, आज सुबह जब वो अपने घर के कामों में व्यस्त थी तब उसको पंचायत से बुलावा आया था | पंचायत पहुचने पर उसने देखा कि एक तरफ रमेसर और दूसरी तरफ उसके बापू और भाई खडें हैं |

पंचों में से एक ने उठ कर सविता की तरफ देख कर बोला " बोल सब्बो ! क्या ये सही है की कल रात को रमेसर तुझे मिलने घर में घुस आया था आया था ?" सविता कुछ नहीं बोली और सर झुका कर खड़ी रही | उसके पिता ने उसका हाँथ पकड़ कर बीच पंचायत में धकेलते हुए बोला " बोलती क्यों नहीं है ? गूंगी हो गयी है क्या ? " सविता डर से थर-थर कांपते हुए अपनी गर्दन हाँ में हिला दी | पंच ने उस से आगे पूछा " क्या तू इस बारे में जानती थी कि रमेसर तुझसे मिलने आने वाला था? " सविता जानती तो थी पर उसने अपने भाई और बापू के डर से ना में गर्दन हिला दी, ये देख कर रमेसर की आँखों में आंसू आ गए और उसने चीख कर बोला " झूठ बोलती है ये, इसको पता है मैं इस से प्यार करता हूँ और ये भी मुझ से प्यार करती है " सविता का भाई आगे बढ़ा और गाँव वालों के बीच से निकलता हुआ रमेसर के सामने पहुंचा और उसको एक जोर का घूंसा मारा फिर चिल्लाया " झूठ बोलता है कमीने, मेरी बहन को बदनाम करता है, मैं तुझको जिन्दा नहीं छोडूंगा " और रमेसर का गला दबाने लगा जबकि पुरे गाँव वाले भी उसके समर्थन में चीखने लगे " मार डाल-मार डाल " अराजकता फैलते देख मुख्य पंच जो गाँव के मुखिया भी थे खड़े हुए और लोगों को शांत कराया और रमेसर को छुड़ाया फिर उन्होंने पूछा " कोई सबूत है क्या तेरे पास " रमेसर सबूत के नाम पर चुप रह गया और नीचे जमीन देखने लगा, "मतलब कोई सबूत नहीं है " मुखिया जी ने बोला " तू एक सीधी-साधी लड़की को बदनाम करना चाहता है, रमेसर तेरे माँ-बाप ने तुझे यही सिखाया है, अब तू बता की ये बदनामी सुन कर कौन परिवार सविता को अपनाएगा, इस बिचारी लड़की की तो जिंदगी ही ख़राब हो जाएगी " मुखिया जी बोले " तूने पंचायत की नजर में अपराध किया है और तुझे इसकी कड़ी सजा मिलेगी ? " बोल कर मुखिया जी पंचों के बीच में जा कर बैठ गए और उनसे सलाह-मशवरा करने लगे, इधर रामेसर के बापू और चाचा अपना हाँथ जोड़े पंचो की तरफ नम आँखों से देख रहे थे | थोड़ी देर के बाद मुखिया जी उठे " रमेसर तूने बहुत बड़ा गुनाह किया है और इस गुनाह के लिए कोई भी सजा छोटी मालूम होती है फिर भी पंचों ने ये फैसला किया है कि पहले तुझे भरी पंचायत में पचास कोड़े सविता का भाई या बापू लगाएगा फिर उसके बाद तुझे और तेरे परिवार को गाँव निकाला का आदेश दिया जाता है, और पंचायत सब्बो के बापू को हिदायत देती है कि उसकी शादी जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी कर दी जाए और इसमें पूरा गाँव और ये पंचायत उसकी मदद करेगी " उन्होंने आगे बोला " कोड़े लगा कर ही ये पंचायत बर्खास्त की जाएगी " रमेसर का बापू हाँथ जोड़ कर बोला " मुखिया जी ! गलती तो इस नालायक रमेसर ने की है तो फिर उसकी सजा हमें क्यों, आप इसके साथ चाहे जो कीजिये लेकिन इसमें मेरे परिवार को गाँव निकला ना दीजिये अभी मेरी दो लड़कियां हैं उनकी शादी कैसे होगी, इसमें उनका क्या दोष है, उनको क्यों सजा मिल रही है, भले ही आप रमेसर को मार डालिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, ऐसी नालायक औलाद से तो बेऔलाद होना अच्छा है " मुखिया जी बोले " नहीं पंचों का फैसला अब नहीं बदल सकता है और तुम्हे मानना ही पड़ेगा, तुमने ही ऐसे घटिया संस्कार दिए हैं अपनी औलाद को, जब एक ऐसा है तो बाकी भी ऐसे ही होंगे, और एक मछली पुरे तालाब को गन्दा करे उस से अच्छा है की उस मछली को ही बहार निकल दिया जाए, हम नहीं चाहते की गाँव के बाकी लड़के भी इस से प्रभावित होकर भविष्य में ऐसा गन्दा काम करें, तुम्हे पंचो के फैसले का मान रखना ही होगा "

कोड़े लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई, कोड़े का दर्द तो था ही पर बेवफाई का दर्द उस से ज्यादा था, अभी मुश्किल से कुछकोड़े ही लगे थे, अगला  कोड़ा लगाने के लिए सविता के भाई ने हाँथ उठाया ही था कि सविता आगे बढ़ कर आई और रमेसर के ऊपर लेट गयी, उसने रोना शुरू कर दिया और साथ ही चीख कर बोली " हाँ मै इनसे प्यार करती हूँ " सविता के भाई का हाँथ हवा में ही रुक गया, वो आवाक् था, पंचायत आवाक् थी, पूरा गाँव आवाक् था | रमेसर का बापू आगे बढ़ा और हाँथ जोड़ कर बोला " माई-बाप ये कौन सा इन्साफ है, गलती तो दोनों ने ही की है तो सजा भी दोनों को मिलना चाहिए ?" सविता अब भी रोये जा रही थी और अपने पल्लू से रमेसर के माथे का पसीना पोंछ रही थी जब उसके बापू ने आ कर उसको एक लात मारा और बोला "मुखिया जी इसको तो मौत की सजा दे दीजिये मुझे नहीं चाहिए ऐसी औलाद " मुखिया अपना सर पकड़ कर बैठ गए और बाकी के पंच एक दुसरे को देखने लगे तब रमेसर का बापू में बोला " मुखिया जी सबसे अच्छा तो होता कि इन दोनों का विवाह किया जा सकता, पर ये भी संभव नहीं है दोनों परिवारों की जाति में बहुत अंतर है " पंच समझ नहीं पा रहे थे कि इस नाकाबिले माफ़ी गुनाह की क्या सजा दी जाए, थोड़ी देर पहले तक तो सब ठीक था पर अचानक से सविता ने सच्चाई बता कर सबको हैरान कर दिया था, मुखिया जी खड़े हुए " दोनों ने ऐसा गुनाह किया है की माफ़ी की तो कोई सोच भी नहीं सकता है, दोनों का विवाह भी नहीं हो सकता है, दोनों की जाति अलग है, एक नीची जाति के रमेसर ने अपने से ऊँची जाति के सविता से प्यार करने का जो दुह्साहस किया है उसकी सजा छोटी-मोटी भी नहीं हो सकती है | सबको पता है ऐसे में क्या करना चाहिए इसलिए पंचायत रमेसर और सब्बो के घर वालों को हिदायत देती है कि ऐसे मामले में जो सदियों से होता आया है वही करें , गाँव के लोग उनका साथ दे सकते हैं, कल तक का समय है अगर उन्होंने कल तक इन्होंने खुद दोनों को सजा नहीं दी तो पंचायत दोनों परिवारों को भी इसी गुनाह का भागीदार मानेगी और उन्हें भी वही सजा देगी जो इन दोनों को मिलनी है "


अगले दिन सुबह खेतों की तरफ जाने वाले लोगों ने देखा, गाँव के बाहर के बरगद के विशाल पेड़ पर कोई दो व्यक्ति झूल रहे हैं, नजदीक से जा कर देखने पर मालूम हुआ कि रमेसर और सविता ने आत्महत्या कर ली है, दोनों ने मरते दम तक एक दुसरे का हाँथ थामा हुआ था, सबको पता था कि ये आत्महत्या नहीं है उस नाकाबिले माफ़ी गुनाह की सजा है जो उन दोनों ने किया था, प्यार नामक गुनाह, जाति से ऊपर उठकर प्यार, पर ये सवाल हमेशा मुह बाये खड़ा रहेगा प्यार वाकई एक गुनाह है ?

Sunday, May 17, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-6

गतांक से आगे ....

राधिका  " मतलब आप नहीं जानते? "
श्याम  " नहीं उस परीक्षा का क्या? "
राधिका  " उसका रिजल्ट आ गया, और आप पास भी हो गए हैं, तो बनती है ना मिठाई? "
श्याम  " क्या बात कर रही हैं आप? आपको कैसे पता आपको मेरा रोल नंबर कैसे पता चला कि आपने मेरा रिजल्ट देख लिया? "
राधिका  " आपने जो फर्जी वाला एडमिट कार्ड भेजा था उसपर केवल डेट बदला था जबकि रोल नंबर के साथ सारे डिटेल्स सही थे मैंने उसी की मदद से देखा "
श्याम  " अच्छा! मैं भी देखता हूँ  "
राधिका  " ठीक है, देखिये फिर बताइए की पार्टी कब है? "
श्याम ने तुरंत अपना रिजल्ट देखा और रिप्लाई किया
श्याम  " अभी तो इंटरव्यू बाकी ही है "
राधिका  " जैसे ये हुआ वैसे ही इंटरव्यू भी हो जायेगा, आप बस ये बतईये कब दे रहे हैं पार्टी? "
श्याम  " आपको कब चाहिए? "
राधिका  " जब आप दें "
श्याम  " ठीक है आ जाइये, मै पार्टी दे देता हूँ "
राधिका  " अभी तो नहीं आ सकती पर जब मै आपसे मिलूंगी तब लुंगी पार्टी "
श्याम  " ठीक है "
उसके बाद श्याम जी जान से अपने इंटरव्यू के लिए तैयारी करने लगा | और उसको अपने मेहनत का फल भी मिला, अब वो बैंक के ब्रांच पर सहायक शाखा प्रबंधक के पद पर तैनात हो गया था | नौकरी मिलने के बाद राधिका और श्याम के बीच में दिन को तो बात नहीं हो पाती थी पर रात में दोनों जरुर बात करते थे | धीरे-धीरे कई महीने बीत गए और उधर मोहन की शादी की सालगिरह भी आ गयी | मोहन को ये तो पता था की श्याम की जिंदगी में कोई है पर कौन है उसे ये नहीं पता था | सालगिरह की पार्टी के लिए मोहन ने सबको बुलाया जिसमे उसने अपनी छोटी बहन के पुरे परिवार को भी बुलाया, सब तो आ चुके थे पर अभी तक राधिका का कोई समाचार नहीं था जबकि श्याम सालगिरह की पार्टी के एक दिन पहले आने वाला था | सारी तैयारियां हो चुकी थी जब मोहन ने आखिरी बार राधिका को बुलाने के लिए फ़ोन किया
मोहन  " हेल्लो ! राधिका जी आप कब आ रही हैं यहाँ ? "
राधिका  " भैया मै तो एक ही शर्त पर आउंगी जो आपको मनना पड़ेगा "
मोहन  " पहले शर्त तो बताइए "
राधिका  " शर्त ये है की किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि मै आ रही हूँ और श्याम ही मुझे लेने रेलवे स्टेशन आये "
मोहन  " ये कैसी शर्त है? "
राधिका  " उन्होंने मुझे भाभी की शादी की सालगिरह में मुझे सरप्राइज दिया था "
मोहन  " तो उसका यहाँ क्या लेना देना है? "
राधिका  " तो उस समय मैंने उन्हें एक सरप्राइज देने का वादा किया था "
मोहन  " पर मुझे उसे ये तो बताना पड़ेगा न कि आपको रेलवे स्टेशन लेने जाना है उसे? "
राधिका  " कोई बहाना बना दीजिये ये आपके ऊपर है "
मोहन  "  ठीक है देखते हैं पर आप आ रही हैं ना? "
राधिका  " आपको ये शर्त मंजूर है या नही? "
मोहन  " ठीक है "
राधिका  " ठीक है मै आ रही हूँ, और एक बात किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए की मै आ रही हूँ "
मोहन  " कब? "
राधिका  " सालगिरह वाले दिन सुबह ४ बजे की गाड़ी से "
मोहन  " ठीक है, मै श्याम से बात करता हूँ "
राधिका  " ठीक है " 

अगले भाग में जारी ....

Friday, May 15, 2015

भाग्य

विवाह के बीस सालों के बाद अब जाकर चौधरी साहब को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी| चौधरी और चौधराईन की ख़ुशी का पारावार ही ना रहा जब उन्हें पता चला कि उनके भी घर एक बच्चे की किलकारी गूजेंगी| १५ की छोटी उम्र में विवाह कर के लाये थे चौधरी और तबसे अब तक उन्हें किसी भी औलाद की प्राप्ति नहीं हुई थी, चौधराईन ने तो घर से निकलना भी बंद कर दिया था, जब भी घर से निकलतीं तो कोई ना कोई उन्हें बाँझ होने का ताना दे ही देता| इस ताने से छुटकारा पाने के लिए चौधराईन ने जहाँ-जहाँ ऊँचा स्थान देखा वहां-वहां अपना माथा टेका था, आखिर अब जा कर बीस सालों के बाद उनकी मनोकामना पूरी हुई थी| चौधरी आज भी उस समाज के मुखिया थे जहाँ लड़के को ही सबकुछ माना जाता था, लड़की होना तो जैसे पाप था, और ऐसे समाज में बीस सालों के बाद एक पुत्र पिता बनना बहुत बड़ी बात थी | जिस दिन से लड़का पैदा हुआ था उस दिन से चौधरी अपनी मूंझों पर ताव देते हुए सीना फुलाकर पुरे गाँव में घूमा करते थे अब किसी की हिम्मत नहीं थी की कोई उन्हें या उनकी चौधराईन को कुछ कह देता|

एक दिन सुबह के वक्त चौधरी जी दरवाजे पर अपनी खाट पर बैठे मन ही मन खुश हो रहे थे कि कहीं से घूमता फिरता एक साधू आया और दरवाजे पर खड़ा होकर भिक्षा के लिए आवाज लगाने लगा, चौधराईन अपने बच्चे को संभाले हुए घर से बाहर निकलीं ...
"महाराज हमारे बच्चे का भविष्य तो बताइये ? " चौधराईन बोलीं
"बच्चा भविष्य तो ऊपर वाले के हाँथ में है फिर भी मैं तो इसका भाग्य ही बता सकता हूँ " साधू बोला
" महाराज पहले यहाँ विराजमान होइए फिर बताइये ?" चौधरी साहब बोले
साधू आगे बढ़कर चौधरी की खाट पर बैठ गया और चौधरी जी खाट से उतर कर उसके पैरों में नीचे बैठ गए,
"बेटा, लाओ बच्चा हमारे हांथों में दो और तुम भी बैठ जाओ " साधू चौधराईन को बोला
चौधराईन ने बच्चे को साधू के हांथों में दिया और वो भी अपने पति के बगल में बैठ गयीं, साधू ने पहले बच्चे के दोनों हांथो को देखा फिर उसका माथा देखा और फिर उसको उल्टा कर के देखा और फिर बोला
" बेटा तुम्हारा बच्चा तो पूर्व जन्म का कोई महर्षि या योगी है, जरुर तुमने कोई बहुत बड़ा पुण्य का काम किया होगा तभी इसने तुम्हारे घर जन्म लिया है, और ये निशान देख रहे हो " साधू ने बच्चे की गर्दन के निचले हिस्से पर बने को दिखा कर बोला
" इस निशान की वजह से मै ये साफ़-साफ़ बता सकता हूँ कि इसके भाग्य में राजयोग है ये आगे चलकर बहुत बड़ा काम करेगा, यह लोगों पर राज करेगा " साधू ने इतना कह कर बच्चा चौधराईन को वापस कर दिया
"अरे ! महाराज को कुछ भोग तो लगाओ, और कुछ दान-दक्षिणा भी दो " चौधरी जी ने खुश होकर चौधराईन से कहा
"क्यों नहीं मैं तो बाबा पर अपना पूरा धन न्योछावर कर दूँ " चौधराईन बोली और उठकर अन्दर चलीं गयीं थोड़ी ही देर में खाने-पीने का सामान लेकर वापस आयीं और साधू को दे दिया
साधू ने जमकर भोग लगाया और तृप्त होकर बोला "बेटा अब हमें जाने दो " पर
चौधराईन बोलीं "अरे महाराज अपनी दक्षिणा तो लेते जाइये "
और उन्होंने अपने हांथों में पहने सोने के भरवां कंगन उतार कर साधू को दे दिया| चौधरी उस समय तो कुछ नहीं बोले पर साधू के जाने के बाद उन्होंने चौधराईन से पूछा
"तुम्हे अपने कंगन इतने प्यारे थे कि कभी उतारती भी नहीं थी अचानक तुम्हे क्या हुआ की उठाकर कंगन ही दे दिया? अरे जब मैंने बोला था कि कुछ दक्षिणा दे दो तो इसका मतलब ये थोड़े ही था, वैसे भी अब हमारे पास ये कंगन ही तो बचे थे इसके अलावा कुछ भी तो नहीं है हमारे पास, हाँ बस दिखावा रह गया है "
चौधराईन थोडा मुस्कुराते हुए बोलीं " अरे जब बेटा बड़ा होकर कमाएगा तो ऐसे कितने ही कंगन बनवा देगा, और मेरी तो कोई बेटी भी नहीं है की उसे देने के लिए मै सहेज कर रखती, इतना अच्छा भविष्य बताया हमारे लड़के का महाराज ने, बिना कुछ दिए विदा कर देती क्या" और सर झटक कर अन्दर चलीं गयी


उसी शाम को जब चौधरी पुरे गाँव में घूम कर सबको अपने बेटे का भविष्य बता कर आये ही थे की एक भिखारी कहीं से भीख माँगता हुआ उनके दरवाजे पर पहुंचा, भिखारी ने जोर से आवाज लगाई "माई इस गरीब को कुछ खाने को दे दो तो बड़ा पुण्य होगा " चौधराईन जब उस भिखारी की आवाज सुनकर एक कटोरे में थोड़े चावल ले कर बाहर आयीं और उस भिखारी को दे दीं, भिखारी अपनी भिक्षा पा कर उन्हें दुआ देता हुआ मुड़ कर अपने रास्ते जाने लगा की चौधराईन चीख मार कर चौखट पर गिर पड़ीं और बेहोश हो गयीं, चौधरी का मुँह खुला का खुला रह गया जब उन्होंने भिखारी की गर्दन के निचले हिस्से पर बने उस निशान को देखा, जो हुबहू उनके बच्चे के निशान का प्रतिरूप लग रहा था, भाग्य और भविष्य तो एक भिखारी का भी होता है |

Sunday, May 10, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-5

गतांक से आगे ....

राधिका इस बात का कोई जवाब न दे सकी क्युकि मन ही मन प्यार तो वो भी करती ही थी पर मानने से मना कर रही थी फिर उसने सोच कर बताने को बोला और फ़ोन रख दिया तीन दिनों तक लगातार उन दोनों की बात न हुई, राधिका का गुस्सा थोडा कम हुआ और उसने सोचा की 'प्यार तो मै भी करती हूँ और श्याम ने तो केवल अपने प्यार का इज़हार किया है न की मुझसे पूछा है तो मतलब की उसको ये नहीं जानना है की मै क्या चाहती हूँ, पर उसने अपने दिल की बात बताई है, तो अगर मै चाहूँ तो बिना कोई उत्तर दिए इस दोस्ती को बरक़रार रख सकती हूँ, हाँ यही करुँगी |' उधर लगातार तीन दिनों से बात न होने के कारण श्याम की हालत ख़राब थी वो पढना-लिखना खाना पीना छोड़ कर शांत बैठा रहता था उसके दोस्त भी परेशान थे की इससे क्या हो गया है पर वो किसी को कुछ बताता ही नहीं था, तीसरे दिन दोपहर को अचानक मोबाइल बजा, राधिका उसको मैसेज तो करेगी नहीं, किसी और का मैसेज होगा ये सोच कर उसने ध्यान नहीं दिया पर थोड़ी देर बाद ही एक और मैसेज आया उसने फिर से ध्यान नहीं दिया फिर जब तीसरा मैसेज आया तो उसने अनमने भाव से मोबाइल उठाया, जैस एही उसने मैसेज देखा ख़ुशी और हैरानी से उछल ही पड़ा, सबसे पहले तो उसे ख़ुशी हुई कि राधिका ने आखिर तीन दिनों के बाद उसको मैसेज किया पर हैरानी हुई जब उसने राधिका का भेजा मैसेज पढ़ा 
राधिका  " मिठाई नहीं खिलाईयेगा क्या? "
राधिका  " बधाई हो "
राधिका  " बताया भी नहीं "
श्याम  " किस बात की मिठाई? आपके नाराज होने की? और क्या नहीं बताया ? "
राधिका  " चलिए बनिए मत ये बताइए की आप पार्टी कब दे रहे हैं? "
श्याम  " किस बात की पार्टी ये सब क्या हो रहा है, एक तो आप मुझे तीन दिनों के बाद मैसेज की और दुसरे मुझे इन अजीब सवालों से हैरान कर रहीं हैं  "
राधिका  " बात ही कुछ ऐसी है और वो बात भूल कर हम आगे बढ़ें तो अच्छा होगा "
श्याम  " ठीक है पर ये तो बताइए ये सब क्या है ? "
राधिका  " आपको सच्ची नहीं पता ? "
श्याम  " नहीं "
राधिका  " चलिए एक हिंट देती हूँ "
श्याम  " ठीक है "
राधिका  " आपने जो परीक्षा दिया था सालगिरह से एक दिन पहले ! "
श्याम  " हाँ दिया तो था पर उसका क्या "


श्याम को राधिका के मैसेज मिलने की ख़ुशी में ये याद ही नहीं रहा उसके उस परीक्षा का भी रिजल्ट आज सुबह आ गया था, पर उसने ये सोचकर कि मेरी तकदीर ही ख़राब है पास ही नहीं हुआ होऊंगा रिजल्ट ही नहीं देखा था,

अगले भाग में जारी ....