Monday, July 27, 2015

वो लड़की

कुछ दोस्तों के साथ बैठा मैं लगातार खिड़की से बाहर देखे जा रहा था, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी, भयंकर गर्मियों के दिन थे, इस भयंकर गर्मी में खिड़की से आती हवा भी कोई राहत नहीं पंहुचा रही थी, मैंने खुद को गर्मी से बचने के लिए अपने गमछे को पानी से भिंगो कर अपने ऊपर लपेट रखा था, इस से कुछ तो राहत थी ही | एक छोटे से स्टेशन पर गाडी रुकी लोग दौड़ते हुए गाडी से उतर कर प्लेटफोर्म पर बने प्याऊ की तरफ दौड़ पड़े, कुछ ने अभी पानी भरा और कुछ अभी भर ही रहे थे कि ट्रेन धीरे-धीरे खिसकने लगी | इस बीच मैंने अपने गमछे को दुबारा भिंगो कर खुद से लपेट लिया था, अब कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा था | अचानक मेरी नजर बगल वाले सीट पर बैठे एक मुस्लिम परिवार पर पड़ी, दो औरतें और एक आदमी एक तरफ बैठे हुए थे | इतनी गर्मी में जबकि मैंने अपने को बचाने के लिए गीले कपडे से ढँक रखा था फिर भी मेरी पीठ टेक लेकर बैठने की वजह से जल चुकी थी जिसका पता मुझे बाद में चला, उस परिवार की दोनों औरतें बुरका पहनें बैठीं थीं जबकि उनके साथ ही बैठा वो इंसान केवल लुंगी में बैठा था | इस बारे में चर्चा चल ही रही थी कि ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुचने वाली थी जिसकी वजह से अब धीमी गति से चल रही थी, हमारे पास भी पानी ख़त्म हो चुका था और मैं अपने दोस्त पर दबाव डाल रहा था कि वो ट्रेन से उतर कर प्याऊ से पानी भरे की अचानक मेरी नजर प्याऊ पर खड़े उस लड़की पर पड़ी |

एक नजर में ही इस भयंकर गर्मी से रहत मिल गयी ऐसा लगा जैसे चाँद अपनी पूरी शीतलता के साथ खुद ही धरती पर उतर आया हो, उस चम्बल के बीहड़ में दोपहर का सूरज भी ऐसा लगा जैसे इस चाँद के आगे सर झुका कर उसकी सुन्दरता का सम्मान करते हुए अपनी कठोरता कुछ कम कर रहा है, सीप सी आँखे जैसे अभी बोल पड़ेंगी, बालों को कस कर बाँधा गया जूडा और उसमे से निकल कर एक लट चेहरे पर इठलाती हुई ऐसे लग रही थी जैसे मोगरे की बेलें किसी पेड़ का आलिंगन करने को उतारू हैं, और अचानक ही उसने वो किया जिसके बारे में मैं सोच रहा था अपने दायें हाँथ से उस नटखट लट को सजा के तौर पर चेहरे से हटाते हुए अपने दायें गालों के पीछे दबा दिया, अब वो लट फिर से उस प्यारे मुखड़े को चूमने के लिए मचल रही थी | इधर उन लटों में मैं इतना उलझा था की समझ नहीं पा रहा था कि मेरा दोस्त क्या बोले जा रहा है, मैं अपलक उस चेहरे को देखे जा रहा था |

कुछ संयत हो कर मैं उठा और अपने दोस्त के हांथों से पानी की बोतल लेकर उस प्याऊ की तरफ झपटा, तेज क़दमों से चलते हुए मैं उसकी तरफ बढ़ा एक-एक पल बरसों में बीत रहा था, फासला कम हो रहा था और सम्मोहन बढ़ रहा था, कब उस सौन्दर्य की जीती-जागती मूर्ति के पास पहुँच गया पता ही नहीं चला, उसके बालों से आती हल्की सुगंध मुझे पागल बना देने पर मजबूर कर रही थी, अचानक ही वो नटखट लट किसी तरह अपने जेल को तोड़कर वापस अपने पुराने काम पर लग चुकी थी, उसने एक बार मेरी तरफ देखा और अचानक ही मेरी नजरों से उसकी नजरें टकरायीं, भावनाएं बह निकलीं ऐसा लगा जैसे मैं अपनी सुध-बुध खो दूंगा, और उधर उसने फिर से एक झटके से अपनी पतली लट को सजा दी, तब मेरी नजर उसके हांथों पर पड़ी, मेहंदी से सजे को हाँथ इस बात का सबूत थे कि ये  सौन्दर्य  किसी और के लिए है |

मेरे पीछे से आते मेरे दोस्त ने मुझे एक हल्का धक्का मारा और मेरे हांथों से पानी की बोतल लेकर पानी भरने लगा, इस बीच पता नहीं कब पर मैंने उस सौन्दर्य की मूर्ति के हांथों को पकड़ा, उसकी आँखे और बड़ी हो गयीं, मैंने उन मेहंदी लगे हांथों पर एक लम्बा और प्रगाढ़ चुम्बन अंकित किया, मेहंदी की खुसबू मेरी नाक से होती हुई दिल तक उतर गयी, उसकी बड़ी हुई पहले आँखे शर्म से झुक गयीं और फिर बंद हो गयीं, अचानक एक लम्बे से आदमी ने मेरी तरफ देखा और मुझे धक्का दिया, उसके हाँथ मेरे हांथों से निकल गए, उसने मुझे एक और धक्का दिया तब जाकर मुझे थोडा होश आया, उसने अपने दाहिने हाँथ को घूसे की शक्ल प्रदान की और मेरे चेहरे की तरफ लहराया, मैं भावनाओं से निकल चुका था और झुक कर उसके प्रहार को खाली जाने दिया, वो लड़खड़ा गया |

अभी तक मै वहीं खड़ा था जब मेरे दोस्त ने मुझे पकड़ कर अपनी तरफ खींचा, ट्रेन पटरियों पर सरकने लगी थी, दोस्त ने मुझे ट्रेन की तरफ धकेला और खुद भी दौड़ पड़ा, आखिर हमने ट्रेन पकड़ ही लिया, दरवाजे पर खड़े होकर मैंने एक बार फिर उस लड़की की तरफ देखा जो उस लम्बू के साथ अपने ट्रेन की तरफ घिसटती जा रही थी, हमारी ट्रेन अभी भी पटरियों पर रेंग रही थी, शायद मुझे उसे देखने का आखिरी मौका दे रही थी, दूसरी तरफ उनकी ट्रेन भी चल दी, मैं अपने होंठो पर उसकी नर्म हथेलियों का अहसास और दिल में बसी मेहंदी की गन्ध लिए एक गहरी सांस भर ट्रेन के दरवाजे से उनकी ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखता रहा, खिड़की से दिखते मेहंदी से रचे उसके हाँथ आखिर क्षितिज में लुप्त हो गए |

Monday, July 6, 2015

वो जो हम में तुम में क़रार था...

आज राजीव की संस्था "मुस्कुराता बचपन" को गरीब बच्चों के लिए किये गए उत्कृष्ट कार्यों के लिए के लिए सम्मान दिया गया था | जिसके बाद उसने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था, जिसमे उसने चंदा देने वाले सभी सभ्यजनों को बुलाया था, खुद ही दरवाजे पर खड़ा होकर उनका स्वागत भी कर रहा था, एक के बाद एक मेहमान आते जा रहे थे, अभी राजीव एक मेहमान और उनकी पत्नी से बात कर ही रहा था कि उसके कंधे पर किसी का हाँथ पड़ा, उसने मुड कर देखा, सामने एक अनजान को खड़ा पा कर उसने अपना हाँथ बढ़ाते हुए बोला " राजीव " और सामने वाले ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ उसका हाँथ अपने हाँथ में थाम कर बोला "समीर , नहीं पहचान पाए न ?" राजीव और समीर एक दुसरे को फ़ोन और फेसबुक के माध्यम से जानते तो थे और उनके बीच में संस्था के कार्यों को लेकर बात भी होती थी पर, मिल पहली बार रहे थे | राजीव ने हँसते हुए कहा " हाँ यार पहचान नहीं पाया, पर तुम्हारी मूछें कहा गयी ? फेसबुक पर तो मुछों वाली फोटोज लगा रखी है ?" समीर चहकते हुए बोला " वो यार, बेगम साहिबा के कहने पर हटा दी " राजीव थोडा मस्ती में बोला " ओहो क्या बात है ! बीबी के गुलाम, खैर भाभी को लाया या नहीं " समीर हँसते हुए बोला " हाँ-हाँ लाया हूँ, शायद थोडा पीछे रह गयी हैं वो लो वो आ गयीं" इतने में समीर की पत्नी रेवती उन दोनों के पास पहुंची, समीर एक तरफ हटते हुए उन दोनों का परिचय करवाया " रेवती ये राजीव  प्रसिद्ध समाज सेवी और "मुस्कुराता बचपन" के कर्ता-धर्ता, और राजीव ये मेरी पत्नी रेवती" राजीव ने मुस्कुराते हुए हाँथ जोड़ कर रेवती की तरफ देखा और फिर देखता ही रह गया...उधर रेवती ने भी अपना हाँथ जोड़ कर राजीव की तरफ देखा...रेवती और राजीव दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि भाग्य उनके साथ ऐसा कैसे कर सकता है, जिस बात को गुजरे हुए तीन लम्बे साल बीत गए थे, आज अचानक उनके सामने कैसे आ गया...दोनों के जेहन में यादों की परतें एक-एक कर खुलती गयीं...समीर का ख्याल कर के दोनों ने एक दुसरे को औपचारिक रूप से नमस्कार किया और फिर रेवती समीर का हाँथ पकड़ अन्दर चली गयी, राजीव यादों की गहराइयों में डूबता चला गया...

करीब तीन साल पहले... राजीव अभी अपनी जिंदगी में कुछ पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, एक शाम जब वो बाजार से सब्जी लेकर, अपनी ही धुन में गुनगुनाता हुआ सड़क के किनारे चलता जा रहा था, अचानक एक जोरदार टक्कर ने उसको अपने ख्यालों से निकल कर धरातल पर ला पटका, सड़क पर गिरने के कारण उसके सर पर चोट लगी जिस से खून बहने लगा, अभी उसको ये समझ भी नहीं आया था की क्या हुआ क्या नहीं, की पीछे से आती आवाज ने उसको सड़क पर लेटे-लेटे ही मुड़ने पर मजबूर कर दिया, " अंधे हो गए हो क्या देख कर नहीं चल सकते, तुम्हे किसने बताया की सड़क के बीच में चलते हैं, जाहिल-गवांर कहीं का ?" राजीव को अब अपनी भूल समझ में आई, कान में लगे हैडफ़ोन और अपनी ही धुन में होने के कारण उसको पता ही नहीं चला की कब वो इस सुनसान गली के एकदम बीच में चलने लगा "पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं हे, तुमको मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली थी क्या ? बेवक़ूफ़ कहीं का" राजीव को अगली आवाज सुनाई दी, उसने उठ कर खुद पर लगे धुल को झाड़ा और फिर हाँथ जोड़ कर बोला " माफ़ कीजिये, गलती हो गयी, ये गली अक्सर सुनसान रहती है, इसलिए मैंने भी ध्यान नहीं दिया" पहली बार उसने उस लड़की की तरफ देखा पर अँधेरे की वजह से कुछ साफ़ नहीं दिखाई दिया, फिर उसने झुक कर उस लड़की की गिरी हुई स्कूटी को उठाया और उसको खड़ा कर उसकी जांच करने लगा, जबकि वो लड़की अपने कपड़ों पर लगी धुल को झाड़ने में व्यस्त थी कि बगल से गुजरने वाली कार ने उसका ध्यान राजीव की तरफ खींचा, कार के प्रकाश में राजीव के सर से निकलते खून को देख कर बोली " ओह, आपको तो काफी चोट लगी है, चलिए मैं आपको हॉस्पिटल ले चलती हूँ " राजीव ने अपने सर पर लगे खून को पोंछा और बोला "नहीं थोड़ी सी चोट है, घर जा कर मैं दवा लगा लूँगा, आप परेशान ना होइए मैं ठीक हूँ " लड़की बोली " ऐसे कैसे ठीक हैं इतना खून बह रहा है, चलिए आपको आपके घर तक छोड़ देती हूँ " राजीव अपनी सब्जियाँ उठाते हुए बोला " नहीं-नहीं रहने दीजिये, मैं चला जाऊंगा" लड़की बोली " ऐसे कैसे मेरी वजह से आपको चोट लगी है, चलिए मैं आपको आपके घर छोड़ देती हूँ" और उसने अपनी स्कूटी स्टार्ट कर दी, राजीव चुप चाप पीछे बैठ गया...

दोनों राजीव के घर पहुंचे, फिर लड़की ने राजीव के सर पर दवा लगाकर पट्टी बाँध दी, उसके बाद राजीव से को बिस्तर पर लिटा कर उस से पूछ कर चाय बना लायी, चाय पीते-पीते बातों का सिलसिला चल पड़ा राजीव ने पूछा " आपने मेरी इतनी मदद की है, और मैं अभी तक आपका नाम भी नहीं जानता हूँ ?" लडकी ने मुस्कुराकर कहा " रेवती, और मै भी तो आपका नाम नहीं जानती हूँ?" राजीव ने अपना नाम बताया और दोनों बातों में मशगूल हो गए, कुछ देर बाद रेवती चली गयी | तीन दिन के बाद रेवती फिर से राजीव के घर आई और इस बार दोनों ने दिन भर बातें की, धीरे-धीरे मिलने का ये सिलसिला चल पड़ा, मिलने मिलाने का ये सिलसिला कब प्यार में बदला दोनों में से कोई नहीं जान सका | साथ जीने और साथ मरने की कसमों के साथ ही ये प्यार और गहरा होता गया, एक दिन राजीव ने रेवती को मिलने के लिए बुलाया और खुद उस जगह पर पहुच कर इंतज़ार करने लगा धीरे-धीरे समय बीतता गया औरसुबह से शाम हो गयी, पर वो ना आई, राजीव इंतज़ार करता ही रह गया | बाद में पता चला कि रेवती के पिता ने उसको मिलने से मना कर दिया, और फिर जल्दी जल्दी में एक लड़का ढूंढ कर उसकी शादी कर दी | वो दिन था और आज का दिन राजीव अभी भी उसका इंतज़ार करता था, और यही एक वजह थी की उसने आज तक शादी नहीं की थी |


मोमिन खान मोमिन की गज़ल की हलकी आवाज ने राजीव को यादों की गहराइयों से निकाल कर वास्तविकता की धरातल पर ला पटका  "वो जो हम में तुम में क़रार था..."

Sunday, June 21, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-11

गतांक से आगे ....

राधिका  " क्या ये आप हैं? "
श्याम  " हाँ हूँ तो मै ही जब मुझे मैसेज किया है तो मै ही होऊंगा ना "
राधिका  " नहीं-नहीं आप मेरी सगाई में आयें हैं क्या? "
श्याम  " हाँ आया तो हूँ, मुझे भी बुलाया गया है "
राधिका  " और आप मेरी बरबादी देखने के लिए आ गए? "
श्याम  " बरबादी कहाँ आप तो आज आबाद हो रही हैं "
राधिका  " ये मजाक का समय नहीं है, सच बताइए क्या हो रहा है ये सब "
श्याम  " आपकी सगाई होने वाली है अभी थोड़ी देर में और आपके घर वाले और लड़के के घर वाले मिल कर शादी का दिन तय कर रहे हैं अभी तो "
राधिका  " फिर मजाक? मैंने पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं? "
श्याम  " क्या चाहती हैं आप की मै न रहूँ यहाँ? चला जाऊ? "
रधिका  " अगर आपको मुझे रोते हुए देखने का शौक है तो रुकिए वरना चले जाइये मै आपका चेहरा भी नहीं देखना चाहती हूँ "
श्याम  " अगर मै चला गया तो समस्या हो जाएगी "
राधिका  " कैसी समस्या? "
श्याम  " आज तक तो मैंने नहीं देखा है की बिना लड़के के ही सगाई हो जाये "
राधिका  " मतलब ? "
श्याम  " मतलब ये मेरी जान, कि मै ही हूँ आपका होने वाला पति, तो कैसा लगा ये सरप्राइज "
राधिका  " अगर ये सच है तो फिर आप नहीं बचेंगे, और अगर झूठ है तो भी आप नहीं बचेंगे  "
सालगिरह के कुछ ही दिनों के बाद राधिका ने अपनी भाभी को ये बात बता दी और उसकी भाभी ने श्याम को फ़ोन किया और सच को जाना, इसके बाद उन्होंने श्याम से पूछा की करना क्या है, और श्याम ने अपना प्लान बताया की क्या, कब और कैसे करना है, शादी कोई छोटा सा काम नहीं है कि कुछ अपरिपक्व लोग मिल कर फैसला कर सकें, इस काम को करने के लिए सबको राजी होना जरुरी होता है क्युकि ये केवल दो लोगो का ही नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन समारोह होता है, केवल शादी से ही दो अलग-अलग परिवार मिलकर एक हो जाते हैं न केवल एक पीढ़ी बल्कि अगली कई पीढ़ियों का रिश्ता हो जाता है ये, इसलिए राधिका और श्याम ने ये फैसला किया था की अगर घर वाले माने तब ही वो दोनों शादी करेंगे वरना नहीं | खैर मोहन ने श्याम के पिताजी से और राधिका की भाभी ने राधिका के पिताजी से बात की और दोनों ने मिल कर किसी तरह उनको मना लिया एक बार को बात कुंडली पर आ कर रुकी पर किसी तरह उसको भी संभल लिया गया जिसमे की पंडित ने ये बताया कि कोई पूजा है जो विवाह से पहले संपन्न करना होगा बाकी सब ठीक था | उधर राधिका की भाभी ने राधिका को नहीं बताया कि उसके पिता जी इस शादी के लिए मान गए हैं और किसी तरह अपने ससुर और सास को भी मना लिया कि जब तक सगाई का दिन नहीं आता तब तक राधिका को भी ये बात ना बताई जाये | जबसे राधिका को पता चला था कि उसकी शादी श्याम से नहीं हो किसी और से हो रही है तब से वो अकेले में चुहुप छुप कर रोती थी, उधर श्याम ये राधिका की ये हालत देख देख कर परेशान रहता था | पर इन सब के बीच में वो बस यही सोचा करता था कि जब राधिका को सच्चाई का पता चलेगा तो उसके चेहरे पर जो शर्म की लाली फैलेगी वही इस नाटक का फल होगा, और आज वो राधिका को इतना खुश देख कर, खुश था कि उसने सरप्राइज ये फैसला लिया, हांलाकि वो ये जानता था कि अब उसे राधिका के वो प्यार भरे झगड़े उसे जिंदगी भर खुश रखेंगे |



-: समाप्त :-

Friday, June 19, 2015

यात्रा - भाग २



रूपा "नहीं कोई समस्या नहीं है बस आपको इस शानदार यात्रा के लिए धन्यवाद बोलने आई थी, पर आप ये कौन सी दवा खा रहे हैं ? "
राघव हंसते हुए "कुछ नहीं भाभी बस थोड़ी सर्दी हो गयी थी तो मैंने ये दवा ले ली आप चिंता ना कीजिये कल सुबह तक ठीक हो जाऊंगा "
रूपा अजीब से नजरों से उसकी तरफ देखते हुए बोली " मुझे दिखाइए कौन सी दवा खा रहे हैं, मुझे तो नहीं लग रह है कि आपको सर्दी हुई है "
राघव " अरे भाभी छोड़िये भी ये बिमारियाँ तो लगी ही रहती हैं  आप क्या करेंगी जान कर ?" और फिर उसने वो दवा की बोतल अपने बैग में डाल दी
रूपा थोड़ी देर उसको घूरती रही और फिर बोली " मुझे वो दवा दिखाइए नहीं तो मै, अभी आपको मेरा गुस्सा पता नहीं है "
राघव " अरे गुस्सा ना होइए, एक शर्त पर बताऊंगा कि आप ये बात मोहित को नहीं बतायेंगी ?"
रूपा "ठीक है पहले दवा दिखाइए, आपको हुआ क्या है ?"
राघव बैग से निकाल कर दवा सी बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए " कुछ नहीं, वैसे तो आप देख कर ही समझ जायेंगी, आप मेरी MBBS भाभी जो हैं "
रूपा ने घूरते हुए उसके हांथों से दवा की बोतल छीन ली और उसपर लिखे नाम को पढने लगी " ये तो.... ये तो....कैंसर की दवाई है, मतलब आपको .......??? "
राघव मुस्कुराते हुए " हाँ अंतिम स्टेज है अधिक से अधिक ३ महीने हैं मेरे पास "
रूपा ने कुछ बोलने के लिए मुह खोला ही था कि मोहित अन्दर आ गया और उस से बोला " चलो रूपा कल सुबह हमें निकलना भी है "
राघव उसको देख कर बोला " आखिर तू मुझ से आज तक नाराज क्यों है ? "
मोहित गुस्से से उसकी तरफ देखा और बोला " तू ही था ना जो चाहता था की मेरी और रूपा की शादी न हो, पर फिर भी हम एक हो ही गए, तुम मुझसे मेरा प्यार छीनना चाहते थे और मैं तुमसे नाराज भी ना होऊं "
और फिर और अधिक गुस्से से बोला " इस बार तो तुमने मुझे बुला लिया पर अगली बार सोचना भी मत, और हाँ ३ महीने ही क्यों हैं तुम्हारे पास ?"
राघव मुस्कुराते हुए " ३ महीने आजादी के उसके बाद मेरी शादी हो जाएगी, मेरी शादी में तो आएगा ना " मोहित कुछ नहीं बोला और मुँह बना कर चला गया
रूपा उसकी तरफ अजीब सी नजरों से देखते हुए बोली " आपने झूठ क्यों बोला की आपकी शादी हो जाएगी ? जबकि आपको पता है कि ३ महीने बाद ...." और रूपा की आँखों में आंसू आ गए
बिस्तर पर बैठने के साथ ही एक फीकी मुस्कान के साथ राघव बोला " नहीं मैंने कोई झूठ नहीं बोला ३ महीने बाद मेरी शादी है, मौत से "
और दूर देखते हुए आगे बोला " फिर मैं और मेरी दुल्हन मौत एक दुसरे के साथ अपनी यात्रा पर निकल जायेंगे, एक ऐसी यात्रा जिसपर हर किसी को एक ना एक दिन जाना ही है, एक ऐसी यात्रा जिसपर मै किसी और को नहीं ले जाना चाहता "
रूपा हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए बोली " तो इसलिए ये यात्रा आपके लिए इतनी महत्वपूर्ण थी ?"
राघव मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा और बोला " हाँ भाभी, और अब आप जाइये मोहित आपका इंतज़ार कर रहा होगा "
रूपा बस एक और सवाल " मोहित और मेरी शादी के खिलाफ क्यों थे आप? "
राघव " किसने कहा कि मैं आप लोगों की शादी के खिलाफ था, आपको शायद पता नहीं पर मोहित के पापा के आपके बारे में मैंने ही बताया था और उनको समझाया भी था, तब जा कर आप लोगों की शादी हुई है "
रूपा " तो फिर ये बात अपने मोहित को क्यों नहीं बताई ?"
राघव " बहुत कोशिश किया पर मोहित ने कभी फ़ोन ही नहीं उठाया और फिर जब उसने मुझे अपनी शादी में नहीं बुलाया तो मै भी थोड़ा नाराज हो गया था | आप भी ये बात मेरे जाने के बाद ही उसको बताइयेगा "


रूपा की आँखों में आंसू आ गए और बिना कुछ बोले वहां से चली गयी, राघव अपनी अगली यात्रा के बारे में सोचते-सोचते कब सो गया पता भी नहीं चला, अगली यात्रा.... अंतिम यात्रा.....

Sunday, June 14, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-10

गतांक से आगे ....

श्याम समझ तो चुका था कि मोहन को सब पता चल गया है और वो इस मौके को कैसे भुनाए इस पर विचार करने लगा, थोड़ी देर सोचने के बाद बोला
श्याम  " बाकी सब तो ठीक है, पर इस कहानी का अंत क्या होगा "
मोहन मुस्कुराते हुए  " ह्म्म्म ये तो तुम्हे सोचना है  "
श्याम  " हाँ पर कोई आईडिया तो दीजिये? "
मोहन  " अंत में शादी करा दो "
श्याम  " पर घर वालो से बात कौन करेगा "
मोहन  " हीरो का भाई "
श्याम  " पर ये रोमांचक नहीं होगा "
मोहन  " तुम्हारे पास कोई आईडिया है तो बताओ? "
श्याम  " शादी तो करा दें दोनों की पर सरप्राइज के साथ "
मोहन  " मतलब? "
श्याम  " या तो दोनों को सरप्राइज दिया जाये या फिर किसी एक को "
मोहन  " दोनों को देना मुश्किल है, किसी एक को ही देना होगा, पर किसको? "
श्याम  " राधिका को, उसको सरप्राइज बहुत पसंद है "
मोहन हँसते हुए  " राधिका ? वो कहा से आ गयी इस कहानी में? "
श्याम  " बस ! रहने दीजिये आपको भी पता है की कहाँ से आई और मुझे भी "
मोहन हँसते हुए  " क्या पता है? "
श्याम  " मेरी मदद करेंगे या नहीं ? "
मोहन गंभीर होकर  " क्यों नहीं? पर मुझे पूरी बात शुरू से बताओ और ये भी किसको-किसको पता है? " 
श्याम  " आपके अलांवा किसी को नहीं "  और फिर उसने पूरी बात बता दी
मोहन  " तो अब करना क्या है? चाचा जी तो तुम्हारे लिए रिश्ता ढूढ रहे हैं और उधर राधिका के पिता जी भी उसके लिए लड़के देख रहे हैं "
श्याम  " बस दोनों को याद दिलाना है, एक दुसरे की जरुरत वो दोनों ही मिल कर पूरी कर सकते हैं "
मोहन  " पर उनको याद कौन दिलाएगा? "
श्याम  " पापा को आप याद दिलाइये और उनके लिए मै किसी और को पकड़ता हूँ "
मोहन  " किसको ? "
श्याम  " राधिका से बात करता हूँ और दीदी से भी "

मोहन  " ठीक है "

सालगिरह के दिन से करीब चार महीने के बाद गर्मी का महिना था ऐसा लगता था कि सूर्य देव भी राधिका के गम में शामिल होने के लिए अपनी सम्पूर्ण ऊष्मा के साथ खुद पधार चुके हैं, आज राधिका की सगाई थी, कोई अनजान सा लड़का था जिसे उसके पिता जी ने पसंद किया था, वो तो यहाँ तक नाराज थे कि राधिका को उस लड़के का फोटो भी दिखाना सही नहीं समझा था | उधर राधिका भी अपने घर वालों से इतना नाराज थी कि उसने फोटो देखने की जिद भी नहीं की और अपनी भाभी को जब वो सबसे छुपाकर फोटो दिखने लायीं तो बोल दिया की अगर पिताजी किसी अंधे लूले लंगड़े से भी मेरी शादी कराएँगे तो भी मै तैयार हूँ | उस पंच सितारा होटल के एक कमरे में राधिका अपने भाभी और सहेलियों के साथ बैठी तैयार हो रही थी जबकि वो लड़का और उसका परिवार अभी आने वाले थे, इसी पंच सितारा होटल में आज उनकी सगाई हो रही थी जो एक दुसरे से अनजान थे यहाँ तक कि कभी एक दुसरे को देखा भी नहीं था | राधिका अभी अपने सर का पल्लू ठीक कर रही थी तब तक उसकी एक सहेली ने बोला लड़के वाले आ गए और लड़का तो सच में लंगड़ा है और वो हंसाने लगी, राधिका ने अचानक चौक कर ऊपर देखा तो उसे किसी की एक झलक उस शीशे में दिखाई दी जो वहां लगाया गया था और जिसके सामने बैठ कर राधिका तैयार हो रही थी, राधिका ने धड़कते हुए दिल से अपना फ़ोन उठाया और तुरंत श्याम को मैसेज किया 

अगले भाग में जारी ....

Friday, June 12, 2015

रावण भाई

हर शुक्रवार की तरह आज भी स्वाति अपनी दादी के साथ घर पर अपनी माँ और पिता जी के आने का इंतज़ार कर रही थी | दादी ने उसे बचपन से ही रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाती थीं जिस वजह से इतनी छोटी सी ही उम्र में उसे रामायण और महाभारत की लगभग हर कहानी और और पात्र याद थे | उसे नहीं पता की माँ और पिता जी हर शुक्रवार को कहाँ जाते हैं, पर दादी कहतीं हैं कि वो दोनों उसके लिए एक भाई की तलाश में जाते है, जबसे उसके माँ और पिता जी ने जाना शुरू किया है तब से स्वाति अपनी दादी के पास रहती है और उनके आने का इंतज़ार करती है, हर शुक्रवार की शाम जब माँ और पिता जी घर आतें हैं तो वो उनसे अपने भाई के बारे में पूछ-पूछ कर हैरान करती है, कई बार तो उसकी माँ ने झुंझला कर उसको डांट भी दिया है, हर डांट के बाद वो रोते हुए अपने दादी के पास चली जाती है और रोते रोते उनके पास ही सो जाती है, पर अगले दिन सब भूल कर फिर से वही बाल-सुलभ चंचलता उसके अन्दर आ जाती है, शायद इसीलिए कहतें हैं कि बालमन की गहराइयों को कोई नहीं समझ सकता है |

शाम को जब स्वाति के पिता जी और माँ आये तो काफी खुश लग रहे थे, आख़िरकार बहुत ही मन्नत, पूजा-पाठ और दवाओं के बाद स्वाति की माँ ७ साल बाद एक बार फिर उम्मीद से जो थी | आज उसके पिता जी ने घर आते ही उसको अपनी गोद में उठा लिया, जबकि माँ वही खड़ी-खड़ी मुस्कुराती रही | दादी ने उनसे पूछा " क्या बात है राहुल बेटा, बहुत खुश लग रहा है, क्या कहा डॉक्टर ने ? “तो स्वाति की माँ शर्मा कर घर के अन्दर चली गयीं | स्वाति के पिता जी ने खुशी से चहकते हुए कहा " हाँ माँ, आज मै बहुत खुश हूँ, बहुत ही ज्यादा " दादी ने पूछा "अरे कुछ बताएगा भी? " राहुल ने स्वाति का माथा चूम कर कहा " अब तेरा भाई जल्दी ही आने वाला है बस कुछ महीने का इंतज़ार और " दादी ख़ुशी के मारे अपने बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गयीं " क्या सच? सच में ? क्या कहा डॉक्टर ने ? " उन्होंने पूछा " माँ डॉक्टर ने कहा है की स्वाति की माँ उम्मीद से हैं, पहला महीना है " पिता जी ने कहा, इन सब बातों के बीच में स्वाति कब उनके हांथो से उतर कर दादी के बिस्तर पर जा कर बैठ गयी ना दादी को पता चला ना ही उसके पिता जी को | स्वाति को दुबारा अपनी गोद में लेते हुए उसके पिता जी ने उस से पूछा " अच्छा बता तो, तुझे कैसा भाई चाहिए?

स्वाति  उनकी गोद से उतर कर दुबारा बिस्तर पर बैठ गयी और सोचने लगी | उसे अपना भाई मिलने की ख़ुशी तो थी पर, उसने ये कभी नहीं सोचा था कि उसे कैसा भाई चाहिए ? हर शुक्रवार को पिता जी और माँ के आने के बाद बस भाई कहाँ है ? कब आएगा ? कैसा है ? इत्यादि सवाल तो वही करती थी पर ये सवाल कि कैसा भाई चाहिए ? बहुत ही अलग और कठिन था " उम्म्म्म, सोनू के जैसा " बहुत सोच कर स्वाति ने बगल के शर्मा जी के ६ साल के बेटे का नाम लिया " नहीं, नहीं, सोनू मुझे चिढ़ाता है, उसके जैसा नहीं " कुछ और सोच कर उसने बोला " फिर कैसा चाहिए ? सोनू तुझे चिढ़ाता है तो तू उसके साथ क्यों खेलती है ?" उसके पिता जी ने एक और प्रश्न किया " अब मेरा भाई आ जायेगा तो नहीं खेलूंगी उस सोनू के साथ, अपने भाई के साथ खेलूंगी, और मेरा भाई उसकी तरह नहीं होना चाहिए " स्वाति सोचते-सोचते बोली, " अरे अगर वैसा नहीं चाहिए तो कैसा चाहिए ? “दादी अपने बिना दांतों के पोपले मुँह से स्वाति का माथा चूम कर बोलीं " मुझे रावण जैसा भाई चाहिए " आखिर स्वाति ने बहुत सोचने के बाद बोला |

ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी दोनों को पिता जी का मुँह खुला का खुला रह गया, जबकि दादी ने एक पल को उसको देखा फिर उसके पिता को और फिर गुस्से में बोलीं " पगला गयी है क्या, जानती नहीं है क्या कि रावण कौन था ? तुझे राम या लक्ष्मण, भरत जैसा भाई नहीं चाहिए, लो देखो अपनी लाड़ली को, इसको रावण जैसा भाई चाहिए " फिर उन्होंने स्वाति को दो थप्पड़ भी लगा दिया " इतनी मिन्नत के बाद तो ये ख़ुशी का दिन आया है और इस कलमुहीं को रावण जैसा भाई चाहिए, तू कुछ बोलता क्यों नहीं ? “थप्पड़ों की वजह से स्वाति रोने लगी थी जबकि उसके पिता ने उसकी तरफ देखा फिर अपनी माँ की तरफ देख कर बोले " देख माँ, पहले तो उस से पूछ की रावण जैसा भाई क्यों चाहिए, और अभी ये पता नहीं कि लड़की होगी या लड़का? अरे मैं तो इस से मजाक में पूछ रहा था, तू तो गंभीर हो गयी लड़के को लेकर " फिर उन्होंने स्वाति के आंसू पोंछे और उस से प्यार से दुलार कर पूछा " बेटा तुमको पता है न कि रावण कौन था, फिर तुझे रावण जैसा भाई क्यों चाहिए ? “पिता के प्यार ने स्वाति को थोडा संभाला |


स्वाति के रोने की आवाज सुन कर उसकी माँ भी वही आ गयी थी, और उसको अपनी गोद में लेकर चुप करने का प्रयास कर रही थी, अब स्वाति रोना छोड़ कर सुबकने लगी थी, उसने सुबकते हुए बोला " हां, माँ मुझे रावण जैसा भाई चाहिए क्युकि, रावण एक ऐसा भाई था जो ये जानते हुए भी कि राम भगवान हैं, उनसे अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध किया, उसके सगे-सम्बन्धी मारे गए,उसका राज्य ख़त्म हो गया लेकिन अपनी बहन के अपमान का बदला लेने की लिए अंत तक लड़ा | तो मुझे लगता है कि मुझे रावण जैसा ही भाई चाहिए कि अगर कोई मेरा अपमान करे तो उसका बदला ले ना कि चुप-चाप बैठा रहे, इसलिए मुझे मेरा भाई रावण की तरह चाहिए | " स्वाति के माँ, पिता जी और दादी अपनी-अपनी जगह पर स्तब्ध खड़े थे | शायद वो भी यही सोच रहे थे कि आज के इस समाज में हर लड़की का भाई रावण ही होना चाहिए, ताकि उस लड़की की तरफ कोई आँख उठा कर भी देख सके |

Sunday, June 7, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-9

गतांक से आगे ....

फिर दोनों वहां से निकल कर चल दिए, घर पहुचने के बाद दोनों अपने अपने काम में व्यस्त हो गए और फिर आपस में बात करने का समय ही नहीं मिला, उधर मोहन ये जानने के लिए बेचैन हो रहा था की क्या बात है आखिर वह हो क्या रहा था? पर उसको मौका नहीं मिल पा रहा था नहीं ही राधिका से बात करने का नहीं श्याम से | आखिर-कार सालगिरह का समारोह समाप्त हुआ जिसमे कि कुछ बहुत ही ख़ास लोग ही शामिल हुए जिसमे कि मोहन और श्याम का परिवार के साथ-साथ राधिका का परिवार और कुछ और नजदीकी लोग थे |समारोह के बाद थक कर मोहन और श्याम छत पर जा कर बैठ गए, अभी वो बैठे ही थे कि किसी ने श्याम को आवाज देकर बुला लिया और वो चला गया, जबकि मोहन वही बैठा रह गया उसको पता था कि जिस लिए भी उसको बुलाया गया है उस काम को कर के श्याम ऊपर ही आएगा | थोड़ी देर के ही बाद राधिका दो कप में चाय लेकर आई और एक कप मोहन को दिया और दूसरा श्याम के लिए वहीँ रख दिया और खुद भी वही बैठ गयी
मोहन  " राधिका एक बात बताओ? "
राधिका  " पूछिये? "
मोहन  " जो मैंने फ़ोन पर सुना वो क्या था? "
राधिका  " क्या मतलब? क्या सुना आपने फ़ोन पर? "
मोहन  " याद करो, कुछ आखिरी प्यार-व्यार की बात हो रही थी "
राधिका  " वो कुछ नहीं था, बस एक मजाक था जो कि आपको सुनाने के लिए किया गया था "
मोहन  " अच्छा ये बात है? "
राधिका  " जी "
मोहन  " फिर श्याम ने क्यों कहा कि आप और वो एक दुसरे से प्यार करते हैं? "
राधिका  " उन्होंने आपको सब बता दिया? "
मोहन  " हाँ, वो मुझसे कुछ नहीं छिपता है "
राधिका  " जब आप सब जानते ही हैं तो मुझसे क्यों पूछ रहे हैं "
मोहन  " बस आपके मुह से सुनना चाहता हूँ, मुझे लगा वो झूठ न बोल रहा हो "
राधिका  " नहीं-नहीं वो झूठ नहीं बोल रहे थे, ये सब सच है, मै आपको पूरी बात बताती हूँ "
उसके बाद राधिका ने मोहन को सारी बात बता दी शुरु के लेकर सुबह तक की
मोहन  " श्याम ने कुछ नहीं बताया था उसको मौका ही नहीं मिला बताने का पर चलो तुमने तो बता दिया, हाँ पहला मौका मिलते ही वो मुझे जरुर बताता "
राधिका  " आप बहुत बदमाश हैं  "
उसके बाद राधिका शर्मा कर भाग गयी, और मोहन वही खड़ा खड़ा हँसता रहा, तभी वहां श्याम वापस आ गया, मोहन ने सोचा कि एक बार इस से भी पूछता हूँ |
मोहन  " तुम लिखते हो ना? "
श्याम  " हाँ थोडा बहुत, क्यों? "
मोहन  " मेरे पास एक कहानी का आईडिया है, तुम उसपर कहानी लिखो "
श्याम  " क्या है कहानी बताइए ? "
मोहन ने फिर राधिका और श्याम की बीच की घटनाओं को कहानी के रूप में सुना दिया, कहानी सुन कर श्याम सोच में पड़ गया,
श्याम  " आपको सब पता चल गया? "
मोहन  " क्या ? "
श्याम  " मतलब आपको कुछ नहीं पता है? "
मोहन  " क्या बात कर रहे हो क्या पता चल गया और क्या नहीं पता है खुल कर बताओ? "

श्याम  " कुछ नहीं " 

अगले भाग में जारी ....