आज राजीव की
संस्था "मुस्कुराता बचपन" को गरीब बच्चों के लिए किये गए उत्कृष्ट कार्यों
के लिए के लिए सम्मान दिया गया था |
जिसके बाद उसने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी का
आयोजन किया था, जिसमे उसने चंदा देने वाले सभी सभ्यजनों को बुलाया था, खुद ही दरवाजे पर खड़ा होकर उनका स्वागत भी कर रहा था, एक के बाद एक मेहमान आते जा रहे थे, अभी राजीव एक मेहमान और उनकी पत्नी से बात कर ही रहा
था कि उसके कंधे पर किसी का हाँथ पड़ा,
उसने मुड कर देखा,
सामने एक अनजान को खड़ा पा कर उसने अपना हाँथ बढ़ाते
हुए बोला " राजीव " और सामने वाले ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ उसका
हाँथ अपने हाँथ में थाम कर बोला "समीर ,
नहीं पहचान पाए न ?" राजीव और समीर एक
दुसरे को फ़ोन और फेसबुक के माध्यम से जानते तो थे और उनके बीच में संस्था के
कार्यों को लेकर बात भी होती थी पर,
मिल पहली बार रहे थे | राजीव ने हँसते
हुए कहा " हाँ यार पहचान नहीं पाया,
पर तुम्हारी मूछें कहा गयी ? फेसबुक पर तो मुछों वाली फोटोज लगा रखी है ?" समीर चहकते हुए बोला " वो यार, बेगम साहिबा के कहने पर हटा दी " राजीव थोडा
मस्ती में बोला " ओहो क्या बात है ! बीबी के गुलाम, खैर भाभी को लाया या नहीं " समीर हँसते हुए बोला
" हाँ-हाँ लाया हूँ,
शायद थोडा पीछे रह गयी हैं वो लो वो आ गयीं"
इतने में समीर की पत्नी रेवती उन दोनों के पास पहुंची, समीर एक तरफ हटते हुए उन दोनों का परिचय करवाया
" रेवती ये राजीव प्रसिद्ध समाज सेवी
और "मुस्कुराता बचपन" के कर्ता-धर्ता, और राजीव ये मेरी
पत्नी रेवती" राजीव ने मुस्कुराते हुए हाँथ जोड़ कर रेवती की तरफ देखा और फिर
देखता ही रह गया...उधर रेवती ने भी अपना हाँथ जोड़ कर राजीव की तरफ देखा...रेवती और
राजीव दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि भाग्य उनके साथ ऐसा कैसे कर सकता है, जिस बात को गुजरे हुए तीन लम्बे साल बीत गए थे, आज अचानक उनके सामने कैसे आ गया...दोनों के जेहन में
यादों की परतें एक-एक कर खुलती गयीं...समीर का ख्याल कर के दोनों ने एक दुसरे को
औपचारिक रूप से नमस्कार किया और फिर रेवती समीर का हाँथ पकड़ अन्दर चली गयी, राजीव यादों की गहराइयों में डूबता चला गया...
करीब तीन साल
पहले... राजीव अभी अपनी जिंदगी में कुछ पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, एक शाम जब वो बाजार से सब्जी लेकर, अपनी ही धुन में गुनगुनाता हुआ सड़क के किनारे चलता जा
रहा था, अचानक एक जोरदार टक्कर ने उसको अपने ख्यालों से निकल
कर धरातल पर ला पटका,
सड़क पर गिरने के कारण उसके सर पर चोट लगी जिस से खून
बहने लगा, अभी उसको ये समझ भी नहीं आया था की क्या हुआ क्या
नहीं, की पीछे से आती आवाज ने उसको सड़क पर लेटे-लेटे ही
मुड़ने पर मजबूर कर दिया,
" अंधे हो गए हो क्या देख कर नहीं
चल सकते, तुम्हे किसने बताया की सड़क के बीच में चलते हैं, जाहिल-गवांर कहीं का ?" राजीव को अब अपनी
भूल समझ में आई, कान में लगे हैडफ़ोन और अपनी ही धुन में होने के कारण
उसको पता ही नहीं चला की कब वो इस सुनसान गली के एकदम बीच में चलने लगा "पता
नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं ? हे, तुमको मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली थी क्या ? बेवक़ूफ़ कहीं का" राजीव को अगली आवाज सुनाई दी, उसने उठ कर खुद पर लगे धुल को झाड़ा और फिर हाँथ जोड़
कर बोला " माफ़ कीजिये,
गलती हो गयी,
ये गली अक्सर सुनसान रहती है, इसलिए मैंने भी ध्यान नहीं दिया" पहली बार उसने
उस लड़की की तरफ देखा पर अँधेरे की वजह से कुछ साफ़ नहीं दिखाई दिया, फिर उसने झुक कर उस लड़की की गिरी हुई स्कूटी को उठाया
और उसको खड़ा कर उसकी जांच करने लगा,
जबकि वो लड़की अपने कपड़ों पर लगी धुल को झाड़ने में
व्यस्त थी कि बगल से गुजरने वाली कार ने उसका ध्यान राजीव की तरफ खींचा, कार के प्रकाश में राजीव के सर से निकलते खून को देख
कर बोली " ओह,
आपको तो काफी चोट लगी है, चलिए मैं आपको हॉस्पिटल ले चलती हूँ " राजीव ने
अपने सर पर लगे खून को पोंछा और बोला "नहीं थोड़ी सी चोट है, घर जा कर मैं दवा लगा लूँगा, आप परेशान ना होइए मैं ठीक हूँ " लड़की बोली
" ऐसे कैसे ठीक हैं इतना खून बह रहा है,
चलिए आपको आपके घर तक छोड़ देती हूँ " राजीव अपनी
सब्जियाँ उठाते हुए बोला " नहीं-नहीं रहने दीजिये, मैं चला जाऊंगा" लड़की बोली " ऐसे कैसे मेरी
वजह से आपको चोट लगी है,
चलिए मैं आपको आपके घर छोड़ देती हूँ" और उसने
अपनी स्कूटी स्टार्ट कर दी,
राजीव चुप चाप पीछे बैठ गया...
दोनों राजीव के
घर पहुंचे, फिर लड़की ने राजीव के सर पर दवा लगाकर पट्टी बाँध दी, उसके बाद राजीव से को बिस्तर पर लिटा कर उस से पूछ कर
चाय बना लायी, चाय पीते-पीते बातों का सिलसिला चल पड़ा राजीव ने पूछा
" आपने मेरी इतनी मदद की है,
और मैं अभी तक आपका नाम भी नहीं जानता हूँ ?" लडकी ने मुस्कुराकर कहा " रेवती, और मै भी तो आपका नाम नहीं जानती हूँ?" राजीव ने अपना नाम बताया और दोनों बातों में मशगूल हो
गए, कुछ देर बाद रेवती चली गयी | तीन दिन के बाद रेवती फिर से राजीव के घर आई और इस
बार दोनों ने दिन भर बातें की,
धीरे-धीरे मिलने का ये सिलसिला चल पड़ा, मिलने मिलाने का ये सिलसिला कब प्यार में बदला दोनों
में से कोई नहीं जान सका |
साथ जीने और साथ मरने की कसमों के साथ ही ये प्यार और
गहरा होता गया, एक दिन राजीव ने रेवती को मिलने के लिए बुलाया और खुद
उस जगह पर पहुच कर इंतज़ार करने लगा धीरे-धीरे समय बीतता गया औरसुबह से शाम हो गयी, पर वो ना आई,
राजीव इंतज़ार करता ही रह गया | बाद में पता चला कि रेवती के पिता ने उसको मिलने से
मना कर दिया, और फिर जल्दी जल्दी में एक लड़का ढूंढ कर उसकी शादी कर
दी | वो दिन था और आज का दिन राजीव अभी भी उसका इंतज़ार
करता था, और यही एक वजह थी की उसने आज तक शादी नहीं की थी |
मोमिन खान मोमिन
की गज़ल की हलकी आवाज ने राजीव को यादों की गहराइयों से निकाल कर वास्तविकता की
धरातल पर ला पटका "वो जो हम में तुम
में क़रार था..."
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