विवाह के बीस सालों के बाद अब
जाकर चौधरी साहब को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी| चौधरी और चौधराईन की ख़ुशी का पारावार ही ना रहा जब उन्हें
पता चला कि उनके भी घर एक बच्चे की किलकारी गूजेंगी| १५ की छोटी उम्र में विवाह कर के लाये थे चौधरी और तबसे अब तक उन्हें
किसी भी औलाद की प्राप्ति नहीं हुई थी, चौधराईन ने तो घर से निकलना भी बंद कर दिया था, जब भी घर से निकलतीं तो कोई ना कोई उन्हें बाँझ होने का
ताना दे ही देता| इस ताने से छुटकारा पाने
के लिए चौधराईन ने जहाँ-जहाँ ऊँचा स्थान देखा वहां-वहां अपना माथा टेका था, आखिर अब जा कर बीस सालों के बाद उनकी मनोकामना पूरी हुई थी| चौधरी आज भी उस समाज के मुखिया थे जहाँ लड़के को ही सबकुछ माना जाता था, लड़की
होना तो जैसे पाप था, और ऐसे समाज
में बीस सालों के बाद एक पुत्र पिता बनना बहुत बड़ी बात थी | जिस दिन से लड़का पैदा हुआ था उस दिन से चौधरी अपनी मूंझों पर ताव देते हुए सीना फुलाकर पुरे गाँव में घूमा करते थे अब
किसी की हिम्मत नहीं थी की कोई उन्हें या उनकी चौधराईन को कुछ कह देता|
एक दिन सुबह के वक्त चौधरी जी
दरवाजे पर अपनी खाट पर बैठे मन ही मन खुश हो रहे थे कि कहीं से घूमता फिरता एक
साधू आया और दरवाजे पर खड़ा होकर भिक्षा के लिए आवाज लगाने लगा, चौधराईन अपने बच्चे को संभाले हुए घर से बाहर निकलीं ...
"महाराज हमारे बच्चे का भविष्य तो बताइये ? " चौधराईन बोलीं
"बच्चा भविष्य तो ऊपर वाले के हाँथ में है फिर भी मैं तो
इसका भाग्य ही बता सकता हूँ "
साधू बोला
"
महाराज पहले यहाँ विराजमान होइए फिर बताइये
?"
चौधरी साहब बोले
साधू आगे बढ़कर चौधरी की खाट पर बैठ गया और चौधरी जी खाट से
उतर कर उसके पैरों में नीचे बैठ गए,
"बेटा, लाओ
बच्चा हमारे हांथों में दो और तुम भी बैठ जाओ " साधू चौधराईन को बोला
चौधराईन ने बच्चे को साधू के हांथों में दिया और वो भी अपने
पति के बगल में बैठ गयीं, साधू ने
पहले बच्चे के दोनों हांथो को देखा फिर उसका माथा देखा और फिर उसको उल्टा कर के
देखा और फिर बोला
" बेटा तुम्हारा बच्चा तो पूर्व जन्म का कोई महर्षि या
योगी है,
जरुर तुमने कोई बहुत बड़ा पुण्य का काम किया होगा तभी इसने
तुम्हारे घर जन्म लिया है, और ये निशान
देख रहे हो " साधू ने बच्चे की गर्दन के निचले हिस्से पर बने को दिखा कर बोला
" इस निशान की वजह से मै ये साफ़-साफ़ बता सकता हूँ कि
इसके भाग्य में राजयोग है ये आगे चलकर बहुत बड़ा काम करेगा, यह लोगों पर राज करेगा " साधू ने इतना कह कर बच्चा चौधराईन को वापस कर दिया
"अरे ! महाराज को कुछ भोग तो लगाओ, और कुछ दान-दक्षिणा भी
दो " चौधरी जी ने खुश होकर चौधराईन से कहा
"क्यों नहीं मैं तो बाबा पर अपना पूरा धन न्योछावर कर
दूँ " चौधराईन बोली और उठकर अन्दर चलीं गयीं थोड़ी ही देर में खाने-पीने का सामान लेकर वापस आयीं और साधू
को दे दिया
साधू ने जमकर भोग लगाया और तृप्त होकर बोला "बेटा अब
हमें जाने दो " पर
चौधराईन
बोलीं "अरे महाराज अपनी दक्षिणा तो लेते
जाइये "
और उन्होंने अपने हांथों में पहने सोने के भरवां कंगन उतार कर साधू को दे दिया| चौधरी उस समय तो कुछ नहीं बोले पर साधू के जाने के बाद
उन्होंने चौधराईन से पूछा
"तुम्हे अपने कंगन इतने प्यारे थे कि कभी उतारती भी
नहीं थी अचानक तुम्हे क्या हुआ की उठाकर कंगन ही दे दिया? अरे जब मैंने बोला था कि कुछ दक्षिणा दे दो तो इसका मतलब ये
थोड़े ही था, वैसे भी अब
हमारे पास ये कंगन ही तो बचे थे इसके अलावा कुछ भी तो नहीं है हमारे पास, हाँ बस दिखावा रह गया है "
चौधराईन थोडा मुस्कुराते हुए बोलीं " अरे जब बेटा बड़ा
होकर कमाएगा तो ऐसे कितने ही कंगन बनवा देगा, और मेरी तो कोई बेटी भी नहीं है की उसे देने के लिए मै सहेज
कर रखती,
इतना अच्छा भविष्य बताया हमारे लड़के का महाराज ने, बिना कुछ दिए विदा कर देती क्या" और सर झटक कर अन्दर
चलीं गयी
उसी शाम को जब चौधरी पुरे
गाँव में घूम कर सबको अपने बेटे का भविष्य बता कर आये ही थे की एक भिखारी कहीं से
भीख माँगता हुआ उनके दरवाजे पर पहुंचा, भिखारी ने जोर से आवाज लगाई "माई इस गरीब को कुछ खाने
को दे दो तो बड़ा पुण्य होगा " चौधराईन जब उस भिखारी की आवाज सुनकर एक कटोरे
में थोड़े चावल ले कर बाहर आयीं और उस भिखारी को दे दीं, भिखारी अपनी भिक्षा पा कर उन्हें दुआ देता हुआ मुड़ कर अपने
रास्ते जाने लगा की चौधराईन चीख मार कर चौखट पर गिर पड़ीं और बेहोश हो गयीं, चौधरी का मुँह खुला का खुला रह गया जब उन्होंने भिखारी की गर्दन के निचले
हिस्से पर बने उस निशान को देखा, जो
हुबहू उनके बच्चे के निशान का प्रतिरूप लग रहा था,
भाग्य और भविष्य तो एक भिखारी का भी होता है |
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