भादों का महीना
था ऐसा लगता था की दो सेनाओं के बीच में भयंकर समर छिड़ा हुआ है एक तरफ पृथ्वी की
सेना तो दूसरी तरफ जल की सेना | जल की सेना ने पृथ्वी की सेनाओं में कोहराम मचा रखा
था, अपने बादलों के
वायुयान पर चढ़कर जल-शरों की वर्षा से पृथ्वी के ह्रदय को बेध कर जीर्ण-शीर्ण कर
दिया था | कृशांगी कोशी आज
अपने पुरे उफान पर थी , गाँव और कस्बों को निगलती हुई किसी पौराणिक राक्षस की
तरह लग रही थी, उसकी लहरें मुह
से फेन निकालती, कई हांथों तक उछल
अपनी भयंकरता का प्रमाण देने में लगी हुई थीं | पगली रोज की तरह आज भी उसके बाढ़ से उफनाये तट पर बैठी
अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रही थी जो पिछले साल ऐसी ही बढ़ में बाह गया था और आज
तक वापस नहीं आया था | उसे हैरत हो रही थी की साल भर एक पतली रेखा की तरह
बहने वाली यह सुरसरि की सहायक नदी इस वर्ष ऐसे क्यूँ लग रही है जैसे की एक चतुर
योद्धा युद्ध लड़ने से पहले अपने पैंतरे बदल रहा हो, कभी एक कदम आगे आती कभी एक कदम
पीछे लौट जाती और फिर किसी नयी वास्तु को निगलने के लिए चक्कर खा कर वापस लौटती | कितने ही झोंपड़े
इस अथाह जलराशि में डगमगाते हुए किसी नशे में चूर शराबी की तरह बहे जा रहे थे | अचानक उसे पीछे
से किसी ने पुकारा "ओ पगली हियाँ का कर रही है, अरे उ नाही आवेगा, चला गया", पगली ने मुड़कर देखा 2 नौजवान लड़के रमई और चित्तन पास
के ही गाँव के, खड़े लहरों का
आनंद ले रहे थे, नया खून किसी
विभत्स नज़ारे का भी आनंद ही लेता है | एक नजर डाल कर पगली दुबारा लहरों की तरफ देखने लगी | अभी भी वही
वीभत्स नजारा था, सहसा एक किश्ती
नजर आई जिसपर कई स्त्री-पुरुष बैठे थे, बैठे क्या थे एक दुसरे से चिपके हुए थे | कश्ती कभी उपर
होती कभी नीचे होती जैसे लहरें उसे पेंग देकर झूला झुला रही हों | लेकिन किसी
अज्ञानी बालक की तरह लहरें ये भूल गयी थीं की ज्यादा पेंग देने पर झूले के भी
पलटने की संभावना होती है | किश्ती पर बैठे लोगों की साँसे टंगी हुई थीं की अब
पलटी तब पलटी |
करवटें लेती
किश्ती आखिर उलट ही गयी, उसपर बैठे सभी प्राणी डूबते-उतरते दिखाई देने लगे, कुछ देर तक दिखाई
दिए फिर वो भी उस जलराशि की तरंगो के हिस्से बन कर खो गए, केवल एक उजली सी
चीज तैरती हुई किनारे की ओर आ लगी | ध्यान से देखने पर प्रतीत हुआ की एक लकड़ी के लठ्ठ के
सहारे चिपका हुआ कोई बच्चा है | पगली और वो दोनों युवक खड़े हो गए थे, तीनो ही उस बच्चे
को निकल लाने के लिए विकल हो रहे थे, पर इस तरह जब नदी बढ़ी हो तो एक कदम भी नदी में रखना
अपनी मौत है, ये वो तीनो ही
जानते थे, रमई जो थोडा
लम्बा था " जाये के त चल जाये लेकिन कहीं पांव उखड जैहें त सीधे बंगाल के
खाड़ी में मिलिहे "
पगली "मै
जाती हूँ"
रमई "जाये
के त हमहूँ तैयार हैं, लेकिन उहाँ तक पहुँच पैबें की ना इम्मा संदेह बा | देख नहीं रही हो
केतना जोरदार तोड़ ह"
पगली एक कदम पानी
में रख के बोली "नाहीं-नाहीं अबहियें निकल लावत हूँ "
रमई सशंक होकर
"काहें नाहक में जान देवे पे तुली हुई हो हम तो जाइये रहत थे"
पगली "तुमको
हमारी कसम है इहाँ न आना, हमको तैरना आता है अबहियें लावत हैं"
चित्तन
"हमको तो तैरना ही न आवत है, पर देखत में तो एक बच्चे का लाश लागत है"
रमई "शायद
अब्बे जान हो, का भरोसा"
चित्तन
"लागत है पगली को तैरना आवत है, जभी हिम्मत हुई"
रमई उसकी की तरफ
चिंतित नजरों से देख कर बोला "हां , कुछ-कुछ त जानत है, हमका तो लज्जा आवत है "
चित्तन "एमा
लज्जा वाला कवन बात, जियत होईत त हमहूँ तोहका भेजते, लेकिन लाश खातिर
कवन आपन जान जोखिम में डाले"
रमई "इहाँ
से कवन जान सकत है की जान है की ना, सहिये बाल-बच्चा वाला मनइ नामरद हो जात है"
उधर पगली
तैरते-तैरते उस लट्ठ तक पहुच चुकी थी, उसने उस पर चिपके हुए बच्चे की बस एक झलक देखा तो उसे
लगा की ये उसका अपना बच्चा है जो पिछले साल इसी बाढ़ में बह गया था | उन्माद में इंसान
को कुछ नहीं सूझता है, पगली अपने बच्चे को पाने के उन्माद में थी और जल्दी
से उसका हांथ पकड़ कर तट की तरफ तैरने लगी, अगर पगली लड़के का हाँथ के बजाये उस लट्ठ को धकेल कर
तट की तरफ ले जाती तो उसको कम उर्जा खर्च करनी पड़ती | पगली तट से कुछ
ही दूर थी की एक लहर के जोर में आ गयी और कुछ दूर तक नदी के साथ साथ बह गयी लेकिन
वो फिर संभली और तट की तरफ दुबारा तैरने लगी लेकिन उसकी हिम्मत अब जवाब देने लगी
थी | एक लहर के जोर से
निकल कर अभी वो एक हाँथ ही तैरी थी की एक और लहर ने उसको दबा दिया | रमई आखिर नदी में
कूद ही पड़ा और जोर जोर से पुकारने लगा "पगली पगली हम आवत हैं |
पगली में अब लड़ने
की शक्ति नहीं थी पर कुछ तो वही लड़के को पाने का उन्माद था जो उसको अभी तक तैरने
पर विवश कर रहा था | रमई जैसे ही उन दोनों के पास पंहुचा एक और लहर आई और
पगली को बहा ले गयी लेकिन बच्चे का हाँथ रमई के हांथों में आ गया, कुछ क्षण बाद ही
पगली के काले बाल नजर आये, परन्तु यह उसकी अंतिम झलक थी | वह फिर न नजर आई |
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