Friday, June 19, 2015

यात्रा - भाग २



रूपा "नहीं कोई समस्या नहीं है बस आपको इस शानदार यात्रा के लिए धन्यवाद बोलने आई थी, पर आप ये कौन सी दवा खा रहे हैं ? "
राघव हंसते हुए "कुछ नहीं भाभी बस थोड़ी सर्दी हो गयी थी तो मैंने ये दवा ले ली आप चिंता ना कीजिये कल सुबह तक ठीक हो जाऊंगा "
रूपा अजीब से नजरों से उसकी तरफ देखते हुए बोली " मुझे दिखाइए कौन सी दवा खा रहे हैं, मुझे तो नहीं लग रह है कि आपको सर्दी हुई है "
राघव " अरे भाभी छोड़िये भी ये बिमारियाँ तो लगी ही रहती हैं  आप क्या करेंगी जान कर ?" और फिर उसने वो दवा की बोतल अपने बैग में डाल दी
रूपा थोड़ी देर उसको घूरती रही और फिर बोली " मुझे वो दवा दिखाइए नहीं तो मै, अभी आपको मेरा गुस्सा पता नहीं है "
राघव " अरे गुस्सा ना होइए, एक शर्त पर बताऊंगा कि आप ये बात मोहित को नहीं बतायेंगी ?"
रूपा "ठीक है पहले दवा दिखाइए, आपको हुआ क्या है ?"
राघव बैग से निकाल कर दवा सी बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए " कुछ नहीं, वैसे तो आप देख कर ही समझ जायेंगी, आप मेरी MBBS भाभी जो हैं "
रूपा ने घूरते हुए उसके हांथों से दवा की बोतल छीन ली और उसपर लिखे नाम को पढने लगी " ये तो.... ये तो....कैंसर की दवाई है, मतलब आपको .......??? "
राघव मुस्कुराते हुए " हाँ अंतिम स्टेज है अधिक से अधिक ३ महीने हैं मेरे पास "
रूपा ने कुछ बोलने के लिए मुह खोला ही था कि मोहित अन्दर आ गया और उस से बोला " चलो रूपा कल सुबह हमें निकलना भी है "
राघव उसको देख कर बोला " आखिर तू मुझ से आज तक नाराज क्यों है ? "
मोहित गुस्से से उसकी तरफ देखा और बोला " तू ही था ना जो चाहता था की मेरी और रूपा की शादी न हो, पर फिर भी हम एक हो ही गए, तुम मुझसे मेरा प्यार छीनना चाहते थे और मैं तुमसे नाराज भी ना होऊं "
और फिर और अधिक गुस्से से बोला " इस बार तो तुमने मुझे बुला लिया पर अगली बार सोचना भी मत, और हाँ ३ महीने ही क्यों हैं तुम्हारे पास ?"
राघव मुस्कुराते हुए " ३ महीने आजादी के उसके बाद मेरी शादी हो जाएगी, मेरी शादी में तो आएगा ना " मोहित कुछ नहीं बोला और मुँह बना कर चला गया
रूपा उसकी तरफ अजीब सी नजरों से देखते हुए बोली " आपने झूठ क्यों बोला की आपकी शादी हो जाएगी ? जबकि आपको पता है कि ३ महीने बाद ...." और रूपा की आँखों में आंसू आ गए
बिस्तर पर बैठने के साथ ही एक फीकी मुस्कान के साथ राघव बोला " नहीं मैंने कोई झूठ नहीं बोला ३ महीने बाद मेरी शादी है, मौत से "
और दूर देखते हुए आगे बोला " फिर मैं और मेरी दुल्हन मौत एक दुसरे के साथ अपनी यात्रा पर निकल जायेंगे, एक ऐसी यात्रा जिसपर हर किसी को एक ना एक दिन जाना ही है, एक ऐसी यात्रा जिसपर मै किसी और को नहीं ले जाना चाहता "
रूपा हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए बोली " तो इसलिए ये यात्रा आपके लिए इतनी महत्वपूर्ण थी ?"
राघव मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा और बोला " हाँ भाभी, और अब आप जाइये मोहित आपका इंतज़ार कर रहा होगा "
रूपा बस एक और सवाल " मोहित और मेरी शादी के खिलाफ क्यों थे आप? "
राघव " किसने कहा कि मैं आप लोगों की शादी के खिलाफ था, आपको शायद पता नहीं पर मोहित के पापा के आपके बारे में मैंने ही बताया था और उनको समझाया भी था, तब जा कर आप लोगों की शादी हुई है "
रूपा " तो फिर ये बात अपने मोहित को क्यों नहीं बताई ?"
राघव " बहुत कोशिश किया पर मोहित ने कभी फ़ोन ही नहीं उठाया और फिर जब उसने मुझे अपनी शादी में नहीं बुलाया तो मै भी थोड़ा नाराज हो गया था | आप भी ये बात मेरे जाने के बाद ही उसको बताइयेगा "


रूपा की आँखों में आंसू आ गए और बिना कुछ बोले वहां से चली गयी, राघव अपनी अगली यात्रा के बारे में सोचते-सोचते कब सो गया पता भी नहीं चला, अगली यात्रा.... अंतिम यात्रा.....

Sunday, June 14, 2015

व्हाट्सएप्प - भाग-10

गतांक से आगे ....

श्याम समझ तो चुका था कि मोहन को सब पता चल गया है और वो इस मौके को कैसे भुनाए इस पर विचार करने लगा, थोड़ी देर सोचने के बाद बोला
श्याम  " बाकी सब तो ठीक है, पर इस कहानी का अंत क्या होगा "
मोहन मुस्कुराते हुए  " ह्म्म्म ये तो तुम्हे सोचना है  "
श्याम  " हाँ पर कोई आईडिया तो दीजिये? "
मोहन  " अंत में शादी करा दो "
श्याम  " पर घर वालो से बात कौन करेगा "
मोहन  " हीरो का भाई "
श्याम  " पर ये रोमांचक नहीं होगा "
मोहन  " तुम्हारे पास कोई आईडिया है तो बताओ? "
श्याम  " शादी तो करा दें दोनों की पर सरप्राइज के साथ "
मोहन  " मतलब? "
श्याम  " या तो दोनों को सरप्राइज दिया जाये या फिर किसी एक को "
मोहन  " दोनों को देना मुश्किल है, किसी एक को ही देना होगा, पर किसको? "
श्याम  " राधिका को, उसको सरप्राइज बहुत पसंद है "
मोहन हँसते हुए  " राधिका ? वो कहा से आ गयी इस कहानी में? "
श्याम  " बस ! रहने दीजिये आपको भी पता है की कहाँ से आई और मुझे भी "
मोहन हँसते हुए  " क्या पता है? "
श्याम  " मेरी मदद करेंगे या नहीं ? "
मोहन गंभीर होकर  " क्यों नहीं? पर मुझे पूरी बात शुरू से बताओ और ये भी किसको-किसको पता है? " 
श्याम  " आपके अलांवा किसी को नहीं "  और फिर उसने पूरी बात बता दी
मोहन  " तो अब करना क्या है? चाचा जी तो तुम्हारे लिए रिश्ता ढूढ रहे हैं और उधर राधिका के पिता जी भी उसके लिए लड़के देख रहे हैं "
श्याम  " बस दोनों को याद दिलाना है, एक दुसरे की जरुरत वो दोनों ही मिल कर पूरी कर सकते हैं "
मोहन  " पर उनको याद कौन दिलाएगा? "
श्याम  " पापा को आप याद दिलाइये और उनके लिए मै किसी और को पकड़ता हूँ "
मोहन  " किसको ? "
श्याम  " राधिका से बात करता हूँ और दीदी से भी "

मोहन  " ठीक है "

सालगिरह के दिन से करीब चार महीने के बाद गर्मी का महिना था ऐसा लगता था कि सूर्य देव भी राधिका के गम में शामिल होने के लिए अपनी सम्पूर्ण ऊष्मा के साथ खुद पधार चुके हैं, आज राधिका की सगाई थी, कोई अनजान सा लड़का था जिसे उसके पिता जी ने पसंद किया था, वो तो यहाँ तक नाराज थे कि राधिका को उस लड़के का फोटो भी दिखाना सही नहीं समझा था | उधर राधिका भी अपने घर वालों से इतना नाराज थी कि उसने फोटो देखने की जिद भी नहीं की और अपनी भाभी को जब वो सबसे छुपाकर फोटो दिखने लायीं तो बोल दिया की अगर पिताजी किसी अंधे लूले लंगड़े से भी मेरी शादी कराएँगे तो भी मै तैयार हूँ | उस पंच सितारा होटल के एक कमरे में राधिका अपने भाभी और सहेलियों के साथ बैठी तैयार हो रही थी जबकि वो लड़का और उसका परिवार अभी आने वाले थे, इसी पंच सितारा होटल में आज उनकी सगाई हो रही थी जो एक दुसरे से अनजान थे यहाँ तक कि कभी एक दुसरे को देखा भी नहीं था | राधिका अभी अपने सर का पल्लू ठीक कर रही थी तब तक उसकी एक सहेली ने बोला लड़के वाले आ गए और लड़का तो सच में लंगड़ा है और वो हंसाने लगी, राधिका ने अचानक चौक कर ऊपर देखा तो उसे किसी की एक झलक उस शीशे में दिखाई दी जो वहां लगाया गया था और जिसके सामने बैठ कर राधिका तैयार हो रही थी, राधिका ने धड़कते हुए दिल से अपना फ़ोन उठाया और तुरंत श्याम को मैसेज किया 

अगले भाग में जारी ....

Friday, June 12, 2015

रावण भाई

हर शुक्रवार की तरह आज भी स्वाति अपनी दादी के साथ घर पर अपनी माँ और पिता जी के आने का इंतज़ार कर रही थी | दादी ने उसे बचपन से ही रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाती थीं जिस वजह से इतनी छोटी सी ही उम्र में उसे रामायण और महाभारत की लगभग हर कहानी और और पात्र याद थे | उसे नहीं पता की माँ और पिता जी हर शुक्रवार को कहाँ जाते हैं, पर दादी कहतीं हैं कि वो दोनों उसके लिए एक भाई की तलाश में जाते है, जबसे उसके माँ और पिता जी ने जाना शुरू किया है तब से स्वाति अपनी दादी के पास रहती है और उनके आने का इंतज़ार करती है, हर शुक्रवार की शाम जब माँ और पिता जी घर आतें हैं तो वो उनसे अपने भाई के बारे में पूछ-पूछ कर हैरान करती है, कई बार तो उसकी माँ ने झुंझला कर उसको डांट भी दिया है, हर डांट के बाद वो रोते हुए अपने दादी के पास चली जाती है और रोते रोते उनके पास ही सो जाती है, पर अगले दिन सब भूल कर फिर से वही बाल-सुलभ चंचलता उसके अन्दर आ जाती है, शायद इसीलिए कहतें हैं कि बालमन की गहराइयों को कोई नहीं समझ सकता है |

शाम को जब स्वाति के पिता जी और माँ आये तो काफी खुश लग रहे थे, आख़िरकार बहुत ही मन्नत, पूजा-पाठ और दवाओं के बाद स्वाति की माँ ७ साल बाद एक बार फिर उम्मीद से जो थी | आज उसके पिता जी ने घर आते ही उसको अपनी गोद में उठा लिया, जबकि माँ वही खड़ी-खड़ी मुस्कुराती रही | दादी ने उनसे पूछा " क्या बात है राहुल बेटा, बहुत खुश लग रहा है, क्या कहा डॉक्टर ने ? “तो स्वाति की माँ शर्मा कर घर के अन्दर चली गयीं | स्वाति के पिता जी ने खुशी से चहकते हुए कहा " हाँ माँ, आज मै बहुत खुश हूँ, बहुत ही ज्यादा " दादी ने पूछा "अरे कुछ बताएगा भी? " राहुल ने स्वाति का माथा चूम कर कहा " अब तेरा भाई जल्दी ही आने वाला है बस कुछ महीने का इंतज़ार और " दादी ख़ुशी के मारे अपने बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गयीं " क्या सच? सच में ? क्या कहा डॉक्टर ने ? " उन्होंने पूछा " माँ डॉक्टर ने कहा है की स्वाति की माँ उम्मीद से हैं, पहला महीना है " पिता जी ने कहा, इन सब बातों के बीच में स्वाति कब उनके हांथो से उतर कर दादी के बिस्तर पर जा कर बैठ गयी ना दादी को पता चला ना ही उसके पिता जी को | स्वाति को दुबारा अपनी गोद में लेते हुए उसके पिता जी ने उस से पूछा " अच्छा बता तो, तुझे कैसा भाई चाहिए?

स्वाति  उनकी गोद से उतर कर दुबारा बिस्तर पर बैठ गयी और सोचने लगी | उसे अपना भाई मिलने की ख़ुशी तो थी पर, उसने ये कभी नहीं सोचा था कि उसे कैसा भाई चाहिए ? हर शुक्रवार को पिता जी और माँ के आने के बाद बस भाई कहाँ है ? कब आएगा ? कैसा है ? इत्यादि सवाल तो वही करती थी पर ये सवाल कि कैसा भाई चाहिए ? बहुत ही अलग और कठिन था " उम्म्म्म, सोनू के जैसा " बहुत सोच कर स्वाति ने बगल के शर्मा जी के ६ साल के बेटे का नाम लिया " नहीं, नहीं, सोनू मुझे चिढ़ाता है, उसके जैसा नहीं " कुछ और सोच कर उसने बोला " फिर कैसा चाहिए ? सोनू तुझे चिढ़ाता है तो तू उसके साथ क्यों खेलती है ?" उसके पिता जी ने एक और प्रश्न किया " अब मेरा भाई आ जायेगा तो नहीं खेलूंगी उस सोनू के साथ, अपने भाई के साथ खेलूंगी, और मेरा भाई उसकी तरह नहीं होना चाहिए " स्वाति सोचते-सोचते बोली, " अरे अगर वैसा नहीं चाहिए तो कैसा चाहिए ? “दादी अपने बिना दांतों के पोपले मुँह से स्वाति का माथा चूम कर बोलीं " मुझे रावण जैसा भाई चाहिए " आखिर स्वाति ने बहुत सोचने के बाद बोला |

ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी दोनों को पिता जी का मुँह खुला का खुला रह गया, जबकि दादी ने एक पल को उसको देखा फिर उसके पिता को और फिर गुस्से में बोलीं " पगला गयी है क्या, जानती नहीं है क्या कि रावण कौन था ? तुझे राम या लक्ष्मण, भरत जैसा भाई नहीं चाहिए, लो देखो अपनी लाड़ली को, इसको रावण जैसा भाई चाहिए " फिर उन्होंने स्वाति को दो थप्पड़ भी लगा दिया " इतनी मिन्नत के बाद तो ये ख़ुशी का दिन आया है और इस कलमुहीं को रावण जैसा भाई चाहिए, तू कुछ बोलता क्यों नहीं ? “थप्पड़ों की वजह से स्वाति रोने लगी थी जबकि उसके पिता ने उसकी तरफ देखा फिर अपनी माँ की तरफ देख कर बोले " देख माँ, पहले तो उस से पूछ की रावण जैसा भाई क्यों चाहिए, और अभी ये पता नहीं कि लड़की होगी या लड़का? अरे मैं तो इस से मजाक में पूछ रहा था, तू तो गंभीर हो गयी लड़के को लेकर " फिर उन्होंने स्वाति के आंसू पोंछे और उस से प्यार से दुलार कर पूछा " बेटा तुमको पता है न कि रावण कौन था, फिर तुझे रावण जैसा भाई क्यों चाहिए ? “पिता के प्यार ने स्वाति को थोडा संभाला |


स्वाति के रोने की आवाज सुन कर उसकी माँ भी वही आ गयी थी, और उसको अपनी गोद में लेकर चुप करने का प्रयास कर रही थी, अब स्वाति रोना छोड़ कर सुबकने लगी थी, उसने सुबकते हुए बोला " हां, माँ मुझे रावण जैसा भाई चाहिए क्युकि, रावण एक ऐसा भाई था जो ये जानते हुए भी कि राम भगवान हैं, उनसे अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध किया, उसके सगे-सम्बन्धी मारे गए,उसका राज्य ख़त्म हो गया लेकिन अपनी बहन के अपमान का बदला लेने की लिए अंत तक लड़ा | तो मुझे लगता है कि मुझे रावण जैसा ही भाई चाहिए कि अगर कोई मेरा अपमान करे तो उसका बदला ले ना कि चुप-चाप बैठा रहे, इसलिए मुझे मेरा भाई रावण की तरह चाहिए | " स्वाति के माँ, पिता जी और दादी अपनी-अपनी जगह पर स्तब्ध खड़े थे | शायद वो भी यही सोच रहे थे कि आज के इस समाज में हर लड़की का भाई रावण ही होना चाहिए, ताकि उस लड़की की तरफ कोई आँख उठा कर भी देख सके |